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खेल'तकदीर का साथ मिले तो पदक जीत सकता हूं'

Thu, 05 Jul 2012 03:43 PM
'तकदीर का साथ मिले तो पदक जीत सकता हूं'

भारत के शीर्ष शॉटपुटर ओमप्रकाश सिंह को बखूबी इल्म है कि वह लंदन ओलंपिक में पदक के दावेदारों में नहीं है लेकिन उसका मानना है कि तकदीर का साथ मिलने पर वह पदक जीत सकता है।
    
पिछले दो साल से हंगरी में अभ्यास कर रहे सिंह ने फोन पर दिए इंटरव्यू में कहा कि उनका पहला लक्ष्य पदक जीतना नहीं बल्कि फाइनल के लिए क्वालीफाई करना है।
    
उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि एथलेटिक्स में किसी भारतीय ने ओलंपिक पदक नहीं जीता है लेकिन मैं खुद पर पदक जीतने का अतिरिक्त दबाव नहीं बनाना चाहता। मेरा पहला लक्ष्य अंतिम दौर तक पहुंचना है। उसके बाद मैं पदक के बारे में सोचूंगा।
     
सिंह ने कहा कि ओलंपिक सबसे बड़ा खेल आयोजन है और हर खिलाड़ी पदक जीतना चाहता है। लेकिन प्रतिस्पर्धा के दिन का प्रदर्शन अहम होता है। मैं खुशकिस्मत हूं कि शीर्ष स्तर के प्रतिस्पर्धियों के बीच हूं। किस्मत ने साथ दिया तो मैं पदक जीतूंगा।
     
उन्होंने कहा कि एक साल पहले हंगरी में आईएएएफ मीट में 20.04 मीटर का थ्रो फेंककर ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया था। उसने हाल ही में शक्ति सिंह का 12 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा था।
     
उन्होंने कहा कि मेरे पास तैयारी के लिए काफी समय था। शुरूआत से मेरा फोकस फिटनेस और मानसिक पहलू पर था। कोहनी में थोड़ी परेशानी थी जो अब ठीक है। मैं पूरी तरह से फिट हूं।

बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर सके ओमप्रकाश का यह पहला ओलंपिक है। उसने कहा कि दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल से उसने सबक सीख लिया है और इस बार अपेक्षाओं के दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उसने कहा कि हर खिलाड़ी पदक जीतना चाहता है, मैं भी। लेकिन इस बार मैं अपेक्षाओं के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकूंगा। मैं अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की कोशिश करूंगा।
    
उन्होंने कहा कि मैंने राष्ट्रमंडल खेलों से सबक ले लिया है। उस समय स्वर्ण पदक जीतने की अपेक्षाओं का बोझ था और मैं पांचवें स्थान पर रहा। एशियाई खेलों में भी मैं चौथे स्थान पर रहा लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
     
उसने कहा कि देश का नाम रोशन करने से बढ़कर कुछ नहीं है। मैं फाइनल दौर के लिए क्वालीफाई करना चाहता हूं। अधिकांश शॉटपुटर 30 बरस की उम्र के पार पदक जीतते हैं लेकिन मैं अभी 25 साल का ही हूं। मेरे पास काफी समय है।
     
सिंह ने कहा कि दबाव का सामना करने के लिए वह इंटरनेट के जरिए एक भारतीय मनोवैज्ञानिक की मदद ले रहे हैं। इसका खर्च ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट ने उठाया है। उसने कहा कि मैं भारतीय मनोवैज्ञानिक वैभव अगाशे के संपर्क में हूं जो निशानेबाजों और तीरंदाजों से भी जुड़े हैं। इसका खर्च ओजीक्यू उठा रहा है। मैं खेल मंत्रालय और अपने नियोक्ता ओएनजीसी का भी शुक्रगुजार हूं।

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