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सजर्न सुपरस्पेशिएलिटी प्रशिक्षण की जरूरत

एक लंबे संघर्ष और कड़ी मेहनत के बाद ही आप सजर्न (ऐसा विशेषज्ञ जो शल्य चिकित्सा या शरीर की चीड़-फाड़ में निपुण होता है) कहलाने के अधिकारी बन पाते हैं। आठ सौ ईसा पूर्व हुए भारतीय चिकित्सक सुश्रुत को सबसे पहला सजर्री विशेषज्ञ माना जाता है। हजारों साल पहले सजर्री के उपकरण पत्थर से बने होते थे और सजर्री बिना एनेसथीसिया यानी बिना बेहोश किए की जाती थी, ऐसे में मरीज को होने वाली पीड़ा की सहज कल्पना की जा सकती है।

शुक्र है कि आधुनिक तकनीक, स्टेनलेस स्टील से बने उपकरण और स्टरलाइजेशन विधि और कई तरह के एनेसथीसिया ने सजर्री की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। ये सभी दर्द कम करने के साथ ही इस प्रक्रिया में संक्रमण होने की आशंका को भी पूरी तरह कम कर देते हैं। कई तरह की जटिलताओं से राहत मिल गई है। ऐसी तकनीकें विकसित की जा चुकी हैं, जिनमें ऑपरेशन के बाद छोटा सा निशान पड़ता है। ऑपरेशन के बाद दर्द कम हो जाता है और तुरंत रिकवरी हो जाती है।

सजर्री को कई शाखाओं में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे प्लास्टिक सजर्री, न्यूरो सजर्री, कार्डियो थोरासिस सजर्री, वेस्कुलर सजर्री, यूरोलॉजी, इंडोसिरिन सजर्री आदि अनेक तरह की सजर्री हैं। पर सबसे प्रमुख विशेषज्ञता सामान्य सजर्री की है, जिसमें न सिर्फ सुपरस्पेशिएलिटी प्रशिक्षण की जरूरत होती है, बल्कि अपने आप में यह सजर्री खास महत्व रखती है।

शेड्यूल
7:30 बजे-नाश्ता
8:30 बजे -हॉस्पिटल/क्लीनिक पहुंचने का समय
9 से 3:30 बजे -सजर्री कार्य
4 से 7 बजे -क्लिनिकल व कंसल्टेंसी कार्य
7:30 बजे -ईमेल चेक व अन्य गतिविधियां
8:30 बजे -घर पहुंचना।

स्किल्स

बीमार और रोगियों को प्रेरित करने और उन्हें ठीक करने की उमंग
निस्वार्थ समर्पण और अपने मरीज के हितों को प्राथमिकता देने की क्षमता
कठिन परिस्थितियों में लगातार कई घंटे काम करने का स्टेमिना। कई बार यह अवधि 24 से 36 घंटे भी हो सकती है।
अच्छा शैक्षिक रिकॉर्ड
ऑपरेशन के समय काम पर एकाग्रता होनी बेहद जरूरी है।

वेतनमान
भारत में सजर्री के लिए एमबीबीएस और जनरल सजर्री में पोस्ट ग्रेजुएशन डिग्री होना जरूरी है। जूनियर रेजिडेंसी का मासिक वेतन 20 हजार रुपये प्रतिमाह होता है। सीनियर रेजिडेंसी को 40 हजार, एसोसिएट कंसल्टेंट को 60 हजार रुपए मिलते है। कंसल्टेंट के लिए कोई सीमा नहीं है।

पक्ष व विपक्ष

किसी का जीवन बचा कर मिलने वाली संतुष्टि
सामाजिक प्रतिष्ठा
उच्च वेतन
तरक्की की अनेक संभावनाएं
कभी-कभी मरीज को न बचा पाने की लाचारी का अहसास
काम की लंबी अवधि, निजी जीवन के लिए समय कम
तनावपूर्ण जीवनशैली
ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं का अभाव
नौकरी के कारण अलग-अलग जगहों पर स्थानांतरण

प्रवेश का तरीका
बारहवीं में फिजिक्स और कैमिस्ट्री के साथ बायोलॉजी होना जरूरी है। बारहवीं पूरी करने के बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा जरूरी है। ऐसे लोग जो कि एमबीबीएस कर चुके हैं, वे आगे पीजी प्रवेश परीक्षा के लिए बैठते हैं। इसके बाद आप एमएस परीक्षा में बैठते हैं। सजर्री में एमएस करने के बाद आप अपनी ट्रेनिंग सीनियर रेजिडेंट के तौर पर शुरू कर सकते हैं। छह साल की ट्रेनिंग के बाद आप सजर्न बन जाते हैं। प्रशिक्षण के अंत में आप चाहें तो किसी सरकारी अस्पताल में नौकरी कर सकते हैं या फिर अपना प्राइवेट क्लिनिक खोल सकते हैं। आप विजिटिंग कंसल्टेंट भी बन सकते हैं।

इंस्टीटय़ूट्स

ऑल इंडिया इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेज
वेबसाइट:
www.aiims.edu

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़
वेबसाइट
: pgimer.nic.in

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी), वेल्लोर
वेबसाइट: vellore.edu/t_main.asp

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली
वेबसाइट: www.mamc.ac/in

संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ
www.sgpgi.ac.in

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