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Review: जानें कैसी है 'मोटू पतलू: किंग ऑफ किंग्स'

Review: जानें कैसी है 'मोटू पतलू: किंग ऑफ किंग्स'

बच्चों के एक मनोरंजक चैनल पर अगर मोटू और पतलू की कार्टून सीरिज नहीं प्रसारित हो रही होती तो शायद आज इन किरदारों के बारे में बच्चों को काफी ज्यादा समझाना-बताना पड़ता, क्योंकि जो लोग 107.2 रेडियो नशा सुनते हैं उनके लिए तो ये किरदार उनके बचपन की यादों में समाए हैं। चाचा चौधरी, पिंकी, महाबली शाका, टार्जन, नागराज, बिल्लू और फैंटम की ही तरह लोटपोट के मोटू-पतलू भी ऐसे कॉमिक्स पात्र हैं, जिनकी दीवानगी 70 से 90 के दशक में जन्मे लोग शायद समझ सकते हैं। अब यह जोड़ी बड़े परदे पर 3डी इफेक्ट्स के साथ आई है। 

यह कहानी शुरू होती है गुड्डू के सर्कस से भागने से। गुड्डू (आवाज विनय पाठक), एक सर्कस का शेर है, जो बेहद डरपोक है और गाजर-मूली खाता है। अन्य शेरों के मुकाबले न तो उसे लड़ना आता है और न ही दहाड़ना। खुद को वह गुड्डू गालिब कहता है। सर्कस से भागने के बाद वह फुरफुरी नगरिया आ पहुंचता है, जहां किसी तरह से वह मोटू (आवाज सौरव चक्रवर्ती) और पतलू (आवाज ओमी शर्मा) के हत्थे चढ़ जाता है, जो उसे राष्ट्रीय उद्यान ले जाने की ठान लेते हैं ताकि गुड्डू का जीवन बचाया जा सके। लेकिन गुड्डू उद्यान जाने को तैयार नहीं है। उसे पता है कि वहां जाते ही अन्य जानवरों के बीच उसकी पोल खुल जाएगी। चूंकि वह शुरू से ही शहर में रहा है, इसलिए उसे जंगल के माहौल में रहने की आदत भी नहीं है। किसी तरह से गुड्डू मोटू पतलू को चकमा देकर भागने में कामयाब हो जाता है। मोटू और पतलू गुड्डू को ढूंढने निकल पड़ते हैं। उनके साथ डॉ. झटका, घसीटाराम और पुलिस इंस्पेक्टर चिंगम भी है। 

दूसरी तरफ जंगल में कुछ और ही कहानी चल रही है। एक खूंखार शिकारी नरसिम्हा जंगल को तबाह करने पर तुला है। वह जंगल काट कर जानवरों को बेघर करना चाहता है और जंगल के बीच बनी एक खदान से सोना लूटना चाहता है। लेकिन इस जंगल के रक्षक और राजा सिंहा (एक बब्बर शेर) के होते नरसिम्हा का ये सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। सिंहा, नरसिम्हा को पहले भी कई बार करारी मात दे चुका है, लेकिन इस बार नरसिम्हा पूरी तैयारी के साथ आया है। उसके पास अत्याधुनिक हथियार हैं और एक वैज्ञानिक भी है, जिसने तमाम खतरनाक जानवरों की ईजाद की है। लेकिन घटनाक्रम कुछ ऐसे घटता है कि सिंहा की लड़ाई मोटू और पतलू की लड़ाई बन जाती है। ये दोनों तो जंगल में गुड्डू को खोजने आए थे, लेकिन अब नरसिम्हा के आंतक से जानवरों को छुटकारा दिलाना ही इनका मकसद बन जाता है। ऐसे ही एक घटनाक्रम के दौरान एक दिन सिंहा की मौत हो जाती है, जिससे जानवरों के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा हो जाता है। मोटू और पतलू चाहते हैं कि गुड्डू सिंहा बनकर न केवल जंगल और जानवरों का नेतृत्व करें, बल्कि नरसिम्हा के जुल्मों से सबको छुटकारा भी दिलवाए। लेकिन गुड्डू इन दोनों की बात नहीं मानता और जंगल से भाग जाता है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि एक संदेश के साथ बच्चों को बेहद आसानी से समझ आ जाने वाली एनिमेशन फिल्म लंबे समय बाद आई है। फिल्म में पर्यावरण रक्षा के जरिए जंगल और जानवरों का हमारे जीवन में क्या महत्व है, समझाया गया है। इस फिल्म में तमाम अच्छी बातें हैं। हंसी-ठहाकों के पल भी हैं। लेकिन यह एनिमेशन 3डी फिल्म स्पेशल इफेक्ट्स और तकनीक के मामले में विदेशी फिल्मों से काफी पीछे दिखती है। आजकल बच्चे 'कुंग फू पांडा', 'र्शेक', 'टॉय स्टोरी', 'दि इंक्रेडेबल्स' सरीखी फिल्मों के एनिमेशन के दीवाने हैं।

डिज्नी की 'दि लायन किंग' को ही आए दो दशक से ज्यादा हो चुके हैं, जिसने अपने खास संगीत के लिए ऑस्कर तक मिला था। यह देखकर हैरत होती है कि कई दृश्य और मुख्य पात्र सिंहा का चित्रण वहां से प्रेरित दिखता है। हालांकि मोटू और पतलू अपने-अपने किरदारों में स्वतंत्र और मस्त दिखते हैं। अगर उच्च स्तरीय एनिमेशन के साथ इस फिल्म में थोड़ी भावुकता और परोसी जाती तो शायद यह और बेहतर कहलाती।

रेटिंग 2.5 स्टार

आवाजें: विनय पाठक, सौरव चक्रवर्ती, ओमी शर्मा 
निर्देशक: सुहास डी.कदव 
निर्माता: केतन मेहता
संगीत : विशाल भारद्वाज 
गीत : गुलजार

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