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केंद्र की मंजूरी के बिना खनन नहीं: सुप्रीम कोर्ट

देश में बढ़ते अवैध खनन पर चिंता प्रकट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से पूर्व अनुमति के बाद ही पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में खनिज पदार्थों के खनन के लिए पटटे दे सकते हैं या उन का नवीनीकरण कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की विशेष वन पीठ ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा मार्च 2010 की उसकी रिपोर्ट में तय दिशानिर्देश और अनेक सिफारिशों को प्रभाव में लाया जाए तथा छह महीने के भीतर अदालत में अनुपालन रिपोर्ट जमा की जाए।

न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने फैसला लिखते हुए कहा कि सालों से असीमित बालू खनन के चिंताजनक स्तर से भारत की नदियां और पारिस्थितिकी बुरी तरह प्रभावित हुई। इससे नदियों में रहने वाले जीवों के प्राकृतिक पर्यावास को नुकसान हुआ है।

शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार द्वारा पिछले साल तीन जून और आठ अगस्त को जारी नीलामी नोटिस के अलावा उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में कथित अवैध खनन के मामले में विचार करते हुए यह निर्देश दिया।

पीठ ने केंद्र द्वारा अधिकृत समिति (सीईसी) की 4 जनवरी, 2012 की रिपोर्ट पर हैरानी जताई जिसमें अवैध खनन गतिविधियों का तथा इनसे पारिस्थितिकी को होने वाले गंभीर खतरों का कोई जिक्र नहीं है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस बात से सहमत है कि बढ़ती निर्माण और बुनियादी संरचना संबंधी गतिविधियों के लिए बालू और खनिजों का खनन जरूरी है लेकिन जैव विविधता, जलीय जीवन और पर्यावरण को खतरे की कीमत पर इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

पीठ ने कहा कि नदी के बहने की दिशा में या विपरीत दिशा में, किसी भी तरफ बालू खनन पर्यावरण को होने वाले नुकसान का एक कारण है और जैव विविधता के लिए खतरा है।

 

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