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एमसी मैरीकोम की सफलता के पांच मंत्र

एमसी मैरीकोम दुनिया की इकलौती महिला मुक्केबाज हैं, जिन्होंने अब तक के सभी छह विश्वकप में कोई न कोई मेडल जीता है। सबसे खास बात यह है कि वे पिछले पांच बार से लगातार विश्व चैंपियनशिप जीतती आ रही हैं। 1 मार्च 1983 को भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में पैदा हुई मैरीकोम पहले एथलीट थीं, लेकिन अपने ही राज्य के अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज डिंको सिंह की सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने बॉक्सिंग में हाथ आजमाने की सोची।

सन 2000 में जब उन्होंने एथलेटिक्स से बॉक्सिंग की ओर रुख किया होगा, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वे विश्व महिला बॉक्सिंग की क्वीन बन जाएंगी। मगर उन्होंने ऐसा कर दिखाया। उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप का अपना पांचवां खिताब कैरेबियाई द्वीप बारबाडोस के ब्रिजटाउन में 18 सितंबर 2010 को 48 किलोग्राम वर्ग में जीता था, जबकि पहले के चार खिताब उन्होंने 46 किलोग्राम वर्ग में जीते थे। उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप का अपना पहला खिताब 2002 में तुर्की में हुए दूसरे वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीता।

उन्होंने लगातार पांच बार नेशनल चैंपियनशिप भी जीती। एक खेल से दूसरे खेल में शिफ्ट होने के बाद इतने कम समय में इतनी उपलब्धियां हासिल कर लेना मैरीकोम जैसी खिलाड़ी के बूते की ही बात है। उनकी ऐतिहासिक सफलता से प्रभावित होकर ऑल इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोशिएशन (एआईबीए) ने उनका जिक्र ‘मैग्निफिशेंट मैरीकोम’ के रूप में किया।

सन 2003 में केवल 20 साल की उम्र में उन्हें प्रतिष्ठित खेल सम्मान ‘अजरुन अवॉर्ड’ और 2006 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया। 2009 में उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान ‘राजीव गांधी खेल रत्न’ से सम्मानित किया गया। मैरीकोम दो प्यारे जुडवां बच्चों की मां हैं और अपने बच्चों को बहुत प्यार करती हैं। अपने बच्चों को पूरा समय देते हुए भी वे लगातार बॉक्सिंग में सक्रिय हैं। उन्होंने मां बनने के बाद भी विश्व चैंपियनशिप सहित कई खिताब जीते। आइए नजर डालते हैं उनकी सफलता के सूत्रों पर:

लक्ष्य निर्धारित करो
मैरीकोम की शानदार सफलता की एक वजह है कि वे पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करती हैं, फिर उसके अनुसार तैयारी करती हैं। पांच बार वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने के बाद अब उनका अगला लक्ष्य लंदन ओलम्पिक-2012 में देश के लिए पदक जीतना है। अब तक उनका जो प्रदर्शन रहा है, उसे देखते हुए यह कोई बहुत मुश्किल काम नहीं लगता।

निष्ठा
मैरीकोम की बॉक्सिंग के प्रति निष्ठा अद्भुत है। मैरीकोम का बॉक्सिंग के प्रति डिवोशन इसी बात से साबित होती है कि उन्होंने अपने बेटे के हॉस्पिटल में एडमिट होने के बावजूद मई 2009 में चीन में संपन्न एशियाई महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। उन्होंने अपने परिवार से वादा किया था कि वे बेटे के लिए गोल्ड मेडल जीतेंगी और उन्होंने अपना वादा निभाया।

बाधाओं से घबराओ मत
मैरीकोम एक गरीब परिवार में पैदा हुईं। उनके मां और पिता जीवनयापन के लिए दूसरे के खेतों में काम करते थे। भाई-बहनों में सबसे बड़ी मैरीकोम ने भी अपने मां-पिता की मदद के लिए खेतों में काम किया, लकड़ियां काटीं और साथ ही अपनी दो छोटी बहनों और एक भाई की देखभाल भी की। वे बचपन से ही एक कामयाब एथलीट बनना चाहती थीं और इतनी मुश्किलात के बावजूद वह अपने सपने को साकार करने में जुटी रहीं। गरीबी और बाधाओं से घबराई नहीं। उसी लगन और दृढ़निश्चय का नतीता आज पूरी दुनिया के सामने है।

दबाव को झेलना सीखो
मैरीकोम का मानना है, किसी भी बड़े काम में दबाव आना स्वाभाविक है, लेकिन आपको सफल होना है तो उस दबाव को ङोलना सीखना होगा। वे अगले साल लंदन में होने वाले ओलम्पिक खेलों की तैयारी में जी-जान से जुटी हुई हैं। दबाव के बारे में वह कहती हैं,  मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि मुझ पर कोई दबाव नहीं होगा, लेकिन इतना लंबा समय मुक्केबाजी में गुजारने के बाद मैं दबाव ङोलना सीख गई हूं।

फिटनेस
मैरीकॉम की स्वर्णिम सफलता की एक बड़ी वजह है उनकी फिटनेस और कड़ा अभ्यास। वे करीब डेढ़ साल बॉक्सिंग रिंग से दूर रहीं और इस दौरान जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। इसके बाद वे वापस रिंग में लौटीं और 2008 में लगातार चौथी बार विश्व चैंपियनशिप जीती। उनके  कड़े अभ्यास और फिटनेस की ही देन थी कि मां बनने के बाद भी उन्होंने अपना वजन नहीं बढ़ने दिया और 46 किलोग्राम वर्ग में ही मुकाबले के लिए उतरीं। पहले तीन खिताब भी उन्होंने इसी वर्ग में जीते थे। यानी 2001 से लेकर 2008 तक सात साल की लंबी अवधि के दौरान  उन्होंने अपना वजन एक किलोग्राम भी नहीं
बढ़ने दिया।

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