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ओलंपिक चयन विवाद ने कराई भारतीय टेनिस की किरकिरी

सितारा खिलाड़ियों के अहम के टकराव के कारण भारत को इस साल लंदन ओलंपिक की टेनिस स्पर्धा में पदक से वंचित रहना पड़ा। इस विवाद के चलते कुछ खिलाड़ियों की बेहतरीन उपलब्धियां भी हाशिये पर चली गई।
     
लिएंडर पेस ने 2012 की शुरूआत अपने नये जोड़ीदार राडेक स्टीपानेक के साथ ऑस्ट्रेलियाई ओपन जीतकर की। इसके साथी ही इस अनुभवी खिलाड़ी का करियर स्लैम पूरा हो गया। वहीं सानिया मिर्जा ने फ्रेंच ओपन मिश्रित युगल में महेश भूपति के साथ खिताब जीता। डब्ल्यूटीए टूर पर भी युगल वर्ग में वह अच्छा प्रदर्शन करती रही।
     
भूपति और रोहन बोपन्ना ने साथ में कुछ खिताब जीते और लंदन में सत्र के आखिरी एटीपी विश्व टूर फाइनल के लिये भी क्वालीफाई किया। ये सब बड़ी उपलब्धियां थी और इनके लिये खिलाड़ी दाद के हकदार थे लेकिन आखिर में टेनिसप्रेमियों को याद रहा इन खिलाड़ियों के बीच ओलंपिक से पहले हुआ चयन विवाद।
     
यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि ओलंपिक में पेस और भूपति के साथ खेलने और मिश्रित युगल में सानिया के भूपति के साथ खेलने पर भारत को पदक जरूर मिलता लेकिन जिस तरह से ये खिलाड़ी जोड़ियों के लिये लड़े, वह निराशाजनक था।
    
खेलों में टीम स्पर्धा में कामयाबी खिलाड़ियों के आपसी तालमेल पर निर्भर करती है। एआईटीए ने भूपति और सानिया की ग्रैंडस्लैम विजेता जोड़ी तोड़कर समझदारी का काम नहीं किया।

इसकी शुरूआत तब हुई जब भूपति और बोपन्ना ने पेस के साथ खेलने से इनकार कर दिया। एआईटीए ने दबाव के आगे क्षुकते हुए दोनों को साथ खेलने दिया लेकिन बाद में डेविस कप टीम से बाहर कर दिया। ग्रैंडस्लैम जीतने वाले पहले भारतीय भूपति अब इस निलंबन को हटाने के लिये कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
    
भूपति पहले ही कह चुके हैं कि पेशेवर खिलाड़ी के तौर पर 2013 उनका आखिरी साल होगा और देश के लिये नहीं खेल पाने से बड़ी त्रासदी उनके जैसे महान खिलाड़ी के लिये क्या होगी।
     
डेविस कप में भारत की ताकत रहे बोपन्ना को भी पता नहीं है कि वह देश के लिये दोबारा खेल सकेंगे या नहीं। इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा नुकसान बोपन्ना को हुआ है क्योंकि पेस और भूपति दोनों अपने करियर के ढ़लान पर है। इनके संन्यास लेने के बाद युवाओं को भारतीय टेनिस को आगे ले जाना होगा।
     
पुरूष टेनिस में सोमदेव देववर्मन, विष्णु वर्धन, युकी भांबरी, सनम सिंह औश्र दिविज शरण जैसे खिलाड़ी हैं लेकिन महिला टेनिस में कोई सानिया की जगह लेने वाला नहीं है। इन युवाओं ने हालांकि चैलेंजर स्तर पर ही अच्छा प्रदर्शन किया है और शीर्ष स्तर पर अभी इन्हें खुद को साबित करना है।

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