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मुद्रास्फीति पर नियंत्रण हो प्राथमिकता

लोकसभा में गुरुवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण में विभिन्न उपायों के जरिए मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने की बात कही गई है। प्रस्तावित उपायों में खासतौर से खाद्यान्न आपूर्ति और बुनियादी कृषि उत्पादों में सुधार लाने तथा वित्तीय एवं राजस्व घाटे पर नियंत्रण करने की नीतियां शामिल हैं।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी तरफ से मौद्रकि नीति को चुस्त बनाया है। मुद्रास्फीति पर काबू पाने के उपायों का हालांकि विकास पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ा है, लेकिन दीर्घकालिक क्षति अथवा बेरोजगारी में वृद्धि का कोई संकेत नहीं है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि सरकार विशेष रूप से समावेशी विकास पर अधिक ध्यान देने की स्थिति में आ गई है। सर्वेक्षण में सिफारिश की गई है कि सरकार की मुख्य चिंता अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को बढ़ाना और आय वितरण में सुधार लाना होना चाहिए।

वित्त वर्ष 2011-12 में कृषि उत्पादकता बढ़ाने और आपूर्ति श्रंखला के प्रबंधन में सुधार की दिशा में कई उपाय किए गए, जिनके अच्छे परिणाम निकले हैं। अक्टूबर 2011 से बचत बैंक ब्याज दरों के नियत्रणमुक्त करने से थोक भावों के मूल्य सूचकांक की स्फीति दर नीचे आई।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि त्वरित वित्तीय सुदृढ़ीकरण ही मुद्रास्फीति को काबू में रखने और विकास का लक्ष्य प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है। कर-जीडीपी अनुपात को बढ़ाकर और खर्च में कटौती कर इसे प्राप्त किया जा सकता है। केंद्र का सकल कर-जीडीपी अनुपात (2011-12) 10.5 प्रतिशत रहा। 2016-17 तक इसे 13 प्रतिशत से आगे ले जाने का उद्देश्य है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार विकास दर के 2012-13 की दूसरी तिमाही से गति पकड़ने की आशा है। 2012-13 में 7.6 प्रतिशत विकास दर की अपेक्षा है। सर्वेक्षण में अपेक्षा की गई है कि 2013-14 में देश यथावत विकास के पथ पर अग्रसर होगा जैसा कि 2008 की वैश्विक मंदी से पहले था।

आर्थिक सर्वेक्षण में बुनियादी क्षेत्र के बारे में कहा गया है कि योजना आयोग ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान निवेश के 10 खरब डॉलर के लक्ष्य की बात कही है। इसमें से लगभग आधा निवेश निजी क्षेत्र से जुटाया जाएगा।

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण देश के विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2012 में मुद्रास्फीति में कमी आएगी और इसके लिए उचित उपाय किए जाएंगे।

वैश्विक खाद्य पदार्थो और कच्चे तेल की कीमतों में हुई वृद्धि के कारण लगातार उच्च स्तर पर बने रहे थोक मूल्य सूचकांक (डब्लयूपीआई) के स्तर में कमी आने के संकेत मिलने लगे हैं, और मार्च 2012 तक इसके 6.5 से 7 प्रतिशत पर आने की उम्मीद है।

वर्ष 2012-13 के दौरान सरकार द्वारा उठाए गए कड़े मौद्रिक और अन्य उपायों के कारण इसमें और भी कमी आने की सम्भावना है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2011-12 के दौरान मौद्रिक नीति का उद्देश्य मुद्रा स्फीति में कमी लाना और इसकी सम्भावनाओं पर निरंतर नजर रखना रहा है।

आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि मौद्रिक नीति के बेहतर समायोजन हेतु भारतीय संदर्भ को देखते हुए नीति दर परिवर्तन और मुद्रास्फीति के बीच सम्पर्को का मूल्यांकन करने की जरूरत है।

मूल्य प्रबंधन के मामले में, आर्थिक समीक्षा में मुद्रास्फीति के नियंत्रण और उससे जुड़ी सम्भावनाओं पर खासतौर से ध्यान देने पर जोर दिया गया है। इन उपायों के अपनाने से वैश्विक मंदी और अतंर्राष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में वृद्धि जारी रहने के बावजूद मार्च तक मुद्रास्फीति दर कम होकर करीब 6.5 से 7.0 प्रतिशत तक रहने की सम्भावना है।

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