DA Image
3 दिसंबर, 2020|4:04|IST

अगली स्टोरी

वो आवाज जो हमेशा रही किशोर

नाम किशोर, मिजाज मनमौजी, अंदाज मस्ताना और सुर के शहंशाह किशोर कुमार के लिए, हर परिचय छोटा है। उनकी आवाज ने संगीत की सीमाएं तोड़ी, अल्फाजों से दर्शन और सुर को जोड़ा, अपने संगीत को हर दिल में बसा दिया, एक ऐसा फनकार, जिसके जीवन को कुछ शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है।
   
चार अगस्त, 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर प्रशिक्षित गायक नहीं थे, लेकिन बड़े भाई अशोक कुमार की तरह उन्हें अभिनय कुछ ज्यादा रास नहीं आया। संगीत में उनका मन रमता था। उनके गायन में आने का वाकया बड़ा ही दिलचस्प है। अशोक कुमार ने एक बार कहा था कि जब किशोर दस साल के थे तब उनकी आवाज कर्कश थी लेकिन उन्हें गायन से प्यार था। एक दिन जब उनकी मां रसोई में सब्जी काट रही थी तो किशोर दौड़ते हुए रसोई में आए और उनका पैर कट गया। पैर में इतना दर्द हुआ कि किशोर विकल हो उठे और एक महीने तक हर दिन घंटों रोते रहे। इतना ज्यादा रोने से उनकी आवाज साफ हो गयी और किशोर, जो अब मधुर स्वर में आए तो फिर कभी थमे नहीं।
   
ब्रिटिश गायक और गीतकार डेविड कर्टनी ने किशोर कुमार पर अपनी ऑनलाइन बॉयोग्राफी बायोग्राफी ऑफ किशोर कुमार में लिखा है कि जहां बॉलीवुड सिनेमा में गायकों को शीर्ष पर पहुंचने और वहां अपनी जगह बनाए रखने में संघर्ष करना पड़ता था वहीं किशोर कुमार को आसानी से यहां प्रवेश मिल गया और वह संगीत की अलग अलग शैलियों में प्रवीणता हासिल कर शीर्ष पर न केवल पहुंचे बल्कि वहां बने भी रहे।

कर्टनी के अनुसार गायक के रूप में किशोर कुमार की प्रतिभा को मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन ने तराशा। किशोर पहले के.एल सहगल की तरह गाते थे, बर्मन ने उनसे अपनी खुद की शैली का विकास करने को कहा। इसके बाद किशोर ने कामयाबी के जो झडे गाड़ना शुरू किया तो अंत तक जारी रहा। किशोर ने उस दौर के लगभग हर संगीतकार के साथ काम किया और अनगिनत हिट गाने दिए। 1970 में किशोर को पहली बार स्टारडम फिल्म आराधना से मिली। हर फिल्म के गीत 'रूप तेरा मस्ताना' से किशोर की आवाज पूरे देश में छा गयी और किशोर को पहली बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला।
   
किशोर कुमार चूंकि मस्तमौला तबीयत के बेहद लापरवाह और फक्कड़ आदमी थे। उन्हें दुनिया का तीन पांच का आंकड़ा समझ में नहीं आता था इसलिए कई बार वह न चाहते हुए थी कई विवादों से जुड़े रहे। व्यक्तिगत जीवन में कई निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें सनकी तक कहा।
   
कुछ पत्रकारों और लेखकों के अनुसार किशोर ने वॉर्डन रोड स्थित अपने बंगले के बाहर किशोर से सावधान का बोर्ड टांग रखा था। किशोर पैसे न मिलने पर काम बीच में ही छोड़ देते थे। लेकिन इसके उलट किशोर बड़े दिलदार और हमदर्द भी थे, उनके मित्र अरूण मुखर्जी की मौत के बाद किशोर नियमित रूप से भागलपुर में उनके परिवार को पैसे भेजते थे। निर्माता विपिन गुप्ता की तंगी के दिनों में किशोर कुमार ने ही उनकी मदद की।
    
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने उनसे कांग्रेस की एक रैली में गाने के लिए कहा कि जिससे उन्होंने इनकार कर दिया। इससे गुस्साकर कांग्रेस सरकार ने आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। अमिताभ और मिथुन चक्रवर्ती के साथ व्यक्तिगत समस्याओं के कारण किशोर ने कुछ समय तक उनके लिए भी अपनी आवाज नहीं दी।
    
'जिदंगी के सफर', 'सागर किनारे', 'हमें और जीने की', 'जिंदगी एक सफर', 'ओ मांझी रे' और 'ओ साथी रे' जैसे अनगिनत सुपरहिट गीत देने वाले किशोर कुमार ने रिकॉर्ड आठ बार सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार जीता।
    
13 अक्टूबर, 1987 को किशोर की मुंबई में हृदयघात से मौत हो गयी। किशोर भले नहीं रहे, लेकिन उनकी आवाज सदा रहेगी, कभी बूढ़ी हुई न होगी, वह किशोर है किशोर ही रहेगी।

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:वो आवाज जो हमेशा रही किशोर