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23 फरवरी, 2020|7:14|IST

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बस इक झिढ़क है यूं ही हाल-ए-दिल सुनाने में

हर हिन्दुस्तानी की रगों में वतन पर मर मिटने का जोश भरने वाला गीत 'कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' लिखकर मुल्क की अदबी तारीख में अमर हो चुके पुरखुलूस शायर क़ैफी आज़मी एक ऐसे फलसफे के राही थे, जिसमें वतन की मिट्टी की महक और बदकिस्मती की सिसकियां लेती ज़िंदगी का दर्द शिद्दत से झलकता था।

साफ दिल और ज़हनियत के मालिक क़ैफी अपने आसपास के माहौल से बेहतर प्रभावित थे और उसका अक्स उनके अशआर और नज़्मों में झलकता है। जहां उनके गीत और संवाद फिल्मी दुनिया को ताकत देते हैं, वहीं उनकी रूह से निकलकर काग़ज़ पर उतरने वाली आवाज़ के एक बोल हज़ारों के हुजूम की रगों में देश भक्ति और इंक़लाब का लहू पल भर में दौड़ाने के लिए काफी हैं।

उर्दू के नामवर शायर और क़ैफी के समकालीन पूर्व राज्यसभा सदस्य बेकल उत्साही ने अपने साथी शायर की शख्सियत पर रोशनी डालते हुए भाषा से कहा कि क़ैफी अपनी डगर के राही थे और उन्होंने उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयां बख्शीं।

उत्साही ने बताया कि क़ैफी आज़मी ने गीतकार के रूप में फिल्मों के लिए जो भी लिखा उसमें भी उन्होंने अदबी रवादारी निभाई और रवायतों का पूरा एहतराम किया। उनके गीतों में साहित्य का सौंदर्य निखरता था और उनकी जबान में काफी शफकत थी।

उन्होंने कहा कि क़ैफी के कलाम में मिट्टी की खुशबू और दिल को छू लेने वाले गंवई माहौल का एहसास होता है। उत्साही ने बताया कि क़ैफी ने ज़मीनी सचाई पर क़लम चलाने के अमीर खुसरो के रिवाज़ को आगे बढ़ाते हुए मेहनतकश मजदूरों, मजलूमों और महिलाओं के दुख-दर्द, भूख, गरीबी और लाचारी को अशआर की शक्ल में काग़ज़ पर उतारा।

सैयद अतहर हुसैन रिज़वी उर्फ क़ैफी आज़मी की पैदाइश उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के छोटे से गांव मेजवां में 14 जनवरी 1919 को हुई। इनके पिता का नाम सैयद फतेह हुसैन रिज़वी और मां का नाम हफीज़ुन्निसा था।
     
क़ैफी के घर में शेर-ओ-शायरी का माहौल था। उन्होंने आठ वर्ष की उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया। क़ैफी ने 11 साल की आयु में एक मुशायरे में अपनी पहली गज़ल 'इतना तो ज़िंदगी में किसी के खलल पड़े, हंसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े' पढ़ी। उनकी यह गज़ल खूब सराही गयी।
     
क़ैफी को अरबी शिक्षा के लिए लखनऊ के सुल्तानुल मदारिस भेजा गया, लेकिन वह जगह उन्हें रास नहीं आयी। वर्ष 1932 से 1942 तक लखनऊ में रहने के बाद क़ैफी कानपुर चले आए और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता ग्रहण कर ली।
     
1947 में जब मुम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी का दफ्तर खुला तो वह मुम्बई चले गए और वहीं रहकर काम करने लगे। उस वक्त तक वह शायरी की दुनिया में काफी मक़बूल हो चुके थे। उनकी शादी शौक़त से हुई जिनसे उनके दो बच्चे हुए। बेटी शबाना आज़मी, जो एक मशहूर फिल्म अभिनेत्री हैं और बेटा बाबा आज़मी, जो एक प्रसिद्ध कैमरामैन हैं।

फिल्मी गीतकार के रूप में भी क़ैफी का सफर बेहद शानदार रहा। उन्होंने वर्ष 1952 में शाहिद लतीफ की फिल्म 'बुज़दिल' के लिए पहला गीत लिखा तो नानू भाई वकील की फिल्मों 'यहूदी की बेटी' (1956), 'परवीन' (1957), 'मिस पंजाब मेल' (1957) और 'ईद का चांद' (1958) में भी उनके लिखे गीत खासे मक़बूल हुए।
    
क़ैफी ने मशहूर फिल्मकार गुरूदत की फिल्म 'काग़ज़ के फूल' (1959), चेतन आनंद की 'हक़ीक़त' (1964) के अलावा 'कोहरा' (1964), 'अनुपमा' (1966), 'उसकी कहानी' (1966), 'सात हिंदुस्तानी' (1969) और 'रज़िया सुल्तान' (1983) में भी गीत लिखे।
    
क़ैफी का पहला कविता संग्रह झनकार वर्ष 1943 में प्रकाशित हुआ। अपने अमर शाहकार आवारा सजदे के लिए उन्हें वर्ष 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वहीं साल 2002 में उन्हें इसी रचना के लिए साहित्य अकादमी फेलोशिप दी गयी।
    
हिंदी फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के रूप में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी दिया गया। उन्हें पदमश्री और राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। क़ैफी एक शख्सियत नहीं बल्कि आंदोलन थे। वह हमेशा कहा करते थे गुलाम हिंदुस्तान में पैदा हुआ हूं, आज़ाद हिंदुस्तान में जी रहा हूं और सोशलिस्ट हिंदुस्तान का सपना अपनी नम आंखों में संजोए हुए हूं। 
     
10 मई 2002 को मुम्बई के जसलोक अस्पताल में यह अज़ीम-ओ-शान शायर यह कहते हुए इस दुनिया से विदा हो गया, 'बहार आये तो सलाम कह देना, मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने'।

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