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15 दिसंबर, 2019|12:07|IST

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थैलीसीमिया: जागरूकता ही इलाज है

क्या कभी कोई सोच सकता है कि वह अनजाने में एक ऐसे रिश्ते में बंधने जा रहा है, जहां वह भावी समाज को बीमार बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा होगा। थैलीसीमिया एक ऐसी ही बीमारी है जो बच्चे को जकड़ती है और धीरे-धीरे फैलती जाती है। इस बीमारी और इससे बचाव के बारे में बता रहे हैं अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. आर.एन.मकरू

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार,
भारत में हर वर्ष 7-10 हजार थैलीसीमिया से ग्रस्त बच्चों का जन्म होता है। एक सर्वे के अनुसार, इंग्लैंड में 360 बच्चे, पाकिस्तान में करीब एक लाख और भारत में दस लाख से अधिक बच्चे थैलीसीमिया से ग्रस्त हैं। यह बीमारी तेजी से फैलती ही जा रही है, लेकिन जागरूकता के द्वारा इस पर काबू पाया जा सकता है।

क्या है थैलीसीमिया
यह एक अलग तरह की बीमारी है, जिसमें रेड ब्लड सेल्स कम हो जाते हैं। इससे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। इस कारण रक्त पूरी तरह से ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं कर पाता।

हर शरीर की अपनी विशेषताएं होती हैं। ये विशेषताएं उन जींस से नियंत्रित होती हैं, जो शरीर के हर सेल में मौजूद रहती हैं। यह जींस हमेशा दो प्रकार की होती हैं। एक मां से मिलती है, दूसरी पिता से। अन्य जींस की तरह ये इन जींस पर ही निर्भर करता है कि हमारे खून में रेड ब्लड सेल्स और हीमोग्लोबिन का स्तर क्या रहेगा। सामान्य व्यक्ति सामान्य ही होगा, क्योंकि उसके माता-पिता सामान्य हैं। लेकिन जहां एक के भी जींस विकारग्रस्त हैं तो उनके बच्चे को दिक्कत होगी ही।

कैसे होता है
यह अनुवांशिक रोग है, जो मां या पिता से विरासत में मिलता है। दिक्कत यह है कि इसका पता तीन माह की आयु के बाद ही होता है। इसमें रोगी के शरीर में खून की कमी होने लगती है।

यदि माता-पिता दोनों सामान्य हैं तो उनके बच्चे थैलीसीमिया से पीड़ित नहीं होंगे।

माता-पिता में से किसी एक को यदि थोड़ा थैलीसीमिया है तो बच्चे को माइनर थैलीसीमिया हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता।

यदि माता-पिता दोनों को माइनर थैलीसीमिया हो तो बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा ज्यादा रहता है। इनमें 25 प्रतिशत बच्चे सामान्य हो सकते हैं, 50 प्रतिशत को बीटा थैलीसीमिया व 25 प्रतिशत को मेजर थैलीसीमिया होने की आशंका होगी।

हीमोग्लोबिन का निर्माण
हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है, अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। जब इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी आ जाती है तो लाल रक्त कोशिकाएं यानी रेड ब्लड सेल्स कम होने या नष्ट होने लगती हैं। ऑरक्त की कमी होने के कारण बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। इसकी कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता। बार-बार खून चढ़ाने से अतिरिक्त लौह तत्व यानी आयरन जमा होने लगते हैं, ऑजो टिश्यूज और ऑर्गेन में जमा हो हृदय, फेफड़ों और यकृत में पहुंचकर नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी यह प्राणघातक भी हो सकते हैं।

मेजर थैलीसीमिया
इसमें बच्चा बीमार और एनीमिक होता है। नॉर्मल हीमोग्लोबिन पचास प्रतिशत तक गिर जाता है, इसलिए खून की कमी से बच्चा पीला और सूखा दिखाई देता है। तिल्ली बढ़ जाती है। उसे लगातार ब्लड ट्रांसफर की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर एक से पांच साल तक के बच्चे को महीने में एक यूनिट ब्लड चढ़ाना पड़ता है।

यदि मेजर थैलीसीमिया वाले बच्चों का इलाज न हो तो वे कमजोर होते चले जाते हैं। उनका विकास रुक जाता है। तिल्ली बढ़ने के कारण पेट ज्यादा बढ़ जाता है। उसके चेहरे की हड्डियां और माथा उभर आता है। यदि ऐसे में इलाज न हो तो मृत्यु निश्चित है।

इसका इलाज
ब्लड ट्रांसफ्यूजन हर चार सप्ताह में करवाना पड़ता है। रक्त लूकोरिड्यूज हो, यह ध्यान रखें। साथ ही आयरन का लेवल चैक करते रहें, जिससे बार-बार रक्त चढ़ाने पर इसकी अधिकता शरीर में न हो। इसमें ऑपरेशन कर तिल्ली को हटाना पड़ता है और हर रोज इंजेक्शन लगवाना होता है। सबसे अच्छा और सफल इलाज है बोन मैरो ट्रांसप्लांट, जो सगे भाई या बहन द्वारा दिया जा सकता है।

लक्षण
इसमें चेहरा सूख जाता है और मुरझाया लगने लगता है।
लगातार कमजोरी व बीमारी की स्थिति बनी रहती है और वजन नहीं बढ़ता।

हेल्दी डाइट है जरूरी
यह अकेली ऐसी बीमारी है, जिसमें हेल्दी और अच्छी डाइट लेनी होती है, ताकि शरीर में पर्याप्त खून बन सके और हेल्दी रहा जा सके। हां, यह ध्यान जरूर रखें कि डाइट में आयरन की मात्र न के बराबर हो। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर फलों व सब्जियों का सेवन करना चाहिए।

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