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फिराक़ की फिक्र रहे न रहे, उनका मुकाम हमेशा रहेगा...

तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ, इसी चिराग से कितने चिराग जल उठे। रघुपति सहाय फिराक़ गोरखपुरी के इस शेर की रोशनी में आज वाकई कई हजार चिराग जल रहे हैं। मुल्क की मिट्टी से उठने वाली महक को अपनी शायरी में बसाने वाले फिराक को याद करते करते कुछ शायर रूंआसे हो जाते हैं।
   
शायरी के आलिम मानते हैं कि फिराक़ की शायरी जीवनरूपी भी है और जीवनदायी भी। उनकी शायरी में हंसता, चहकता, सिसकता, विचार करता, संघर्ष करता और सच की तलाश करता हुआ इंसान दिखाई पड़ता है। काबिले ग़ौर है कि उनकी शायरी में आशिक और महबूब परंपरा से दूर अपनी अलग दुनिया बसाये हुये हैं—
शाम भी थी धुंआ धुंआ, हुस्न भी था उदास उदास,
दिल को कई कहानियां याद सी आके रह गईं।
   
यूं तो फिराक़ अपनी गज़ल के लिये जाने जाते हैं पर उन्होंने गज़ल के साथ साथ नज्मों और रूबाइयों के जरिये भी काफी कुछ कहा है। उन्होंने अपनी रूबाइयों को एक नया लहजा और नई आवाज अता की। 
   
मशहूर शायर मुनव्वर राणा कहते हैं कि फिराक़ की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने उर्दू की गजल और शायरी की दुनिया को संस्कृत के हुस्न से मालामाल किया। मकबूल शायर राहत इंदौरी भी कहते हैं कि फिराक एक ही वक्त में तीन पीढ़ियों के शायर थे और अपनी गज़लों में 22 से 25 शेर कह दिया करते थे।
    
हालांकि मुनव्वर ने कहा कि फिराक़ साहब को उतना सम्मान नहीं मिला जितना उन्हें मिलना चाहिये था। वह कहते हैं कि अगर वह किसी और मुल्क में हुये होते तो उनकी याद में फिराकनगर नाम का शहर बसा दिया गया होता। वहीं राहत इंदौरी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने भाषा को विशेष बातचीत में बताया कि किसी भी शायर का कद हुकूमती ऐहतराम का मोहताज़ नहीं होता। उनका मानना है कि कलाकारों को दिये जाने वाले सम्मान केवल सियासी तोहफे हैं।
   
मुनव्वर ने बताया कि फिराक़ के इंतकाल के बाद जिस क्वार्टर में वह रहते थे वह उनके परिवार वालों से खाली करा लिया गया और वह भी उनकी किताबों को फेंक कर। बताया जाता है कि फिराक और नेहरू परिवार के बीच ऐसे संबंध थे कि जवाहर लाल नेहरू उनको हमेशा रघुपति कहकर ही संबोधित करते थे और फिराक़ उनको हमेशा जवाहर लाल कहकर पुकारा करते थे। वहीं इंदिरा उन्हें चाचा कहती थीं तो वह उन्हें इंदु।
   
मशहूर शायर मंसूर उस्मानी का कहना है कि फिराक जिगर की याद दिलाते हैं। उनका मानना है कि फिराक के शेर महबूब के कूचे से होते हुये वेदों और उपनिषदों की सैर कराते हैं। मंसूर कहते हैं कि फिराक़ का कमाल था कि वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाते और यह उर्दू की खुशबू थी जिसने उन्हें रघुपति सहाय से फिराक़ गोरखपुरी बना दिया।
   
तीन मार्च 1982 को रघुपति सहाय ने भले ही अपनी आखिरी सांस ली हो पर फिराक गोरखपुरी आज भी जिंदा हैं। और जब तक उर्दू की खनक, शायरी की चमक, गंगा जमनी तहज़ीब की महक जिंदा रहेगी तब तक फिराक का वजूद रहेगा। 

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