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खास छात्रों के लिए खास इंतजाम

विकलांग छात्रों के लिए इस परीक्षा से नई लागू होगी नीति

दिल्ली विश्वविद्यालय विकलांग छात्र-छात्राओं के लिए नई नीति लाने जा रहा है। ये नई नीति इस सत्र में होने वाली परीक्षाओं से प्रभावी होगी। नीति के तहत छात्रों को विकलांगता के स्तर के आधार पर भी छूट मिलेगी।

विश्वविद्यालय का मानना है कि कई बार देखने में आता है कि एक ही मर्ज के विकलांग छात्रों की विकलांगता का स्तर अलग-अलग होता है। साथ ही विकलांगता के कई अनोखे मामले भी सामने आते हैं। जिनमें छात्र को स्क्राइब देना या अन्य विकलांग छात्रों के बराबर ही समय आवंटित करना उन छात्रों के साथ अन्याय होता है। ऐसे में विकलांग छात्रों के लिए एकसमान गाइडलाइंस कारगर नहीं होती। इसलिए गाइडलाइंस में बदलाव की जरूरत है।

विश्वविद्यालय ने इन बातों को ध्यान में रखते हुए एक समिति का गठन किया है जो विकलांग छात्रों की सुविधा के अनुरूप गाइडलाइंस तैयार करेगी। गाइडलाइंस में डब्ल्यूएचओ की सूची से ऐसे गैजेट चुने जाएंगे जो अलग-अलग स्तर की विकलांगता के लिहाज से छात्रों के लिए मददगार हो। सूत्रों के मुताबिक समिति छात्रों को मर्ज के अनुसार सॉफ्टवेयर और गैजेट उपलब्ध कराने के अलावा समय सीमा में भी बदलाव कर सकती है।
इसके अलावा समिति ने स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता में बदलाव करने का भी सुझाव दिया है। मौजूदा समय में स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता परीक्षार्थी से कम होती है। समिति का कहना है कि स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता कम होने से परीक्षार्थी को कई मुश्किलें आती है ऐसे में कम से कम स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता परीक्षार्थी के समकक्ष होनी चाहिए।

मौजूदा समय में ये सुविधाएं
छात्र इंटरप्रेटर, लैपटॉप का इस्तेमाल और डिसेबल फ्रेंडली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
स्क्राइब और इंटरप्रेटर को मेहनताना विश्वविद्यालय देता है। विश्वविद्यालय राइटर्स और इंटरप्रेटर्स को प्रतिदिन के हिसाब से 250 रुपए मेहनताना देता है।
लोकोमीटर अपंगता जैसी बीमारियों से पीड़ित छात्रों के लिए बैठने का स्पेशल इंतजाम और रेस्टरूम का प्रबंध किया जाता है। 
स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता परीक्षार्थी से कम होती है। साथ ही जिन स्क्राइब की शैक्षिक योग्यता अधिक है उनके विषय परीक्षार्थी से अलग होने चाहिए।

बैठक में उठा निव्या का मामला
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स ग्लोबल बिजनेस ऑपरेशन की पढ़ाई कर रही निव्या सुब्रमण्यम के लिए लिख पाना मुश्किल काम है। वह 75 प्रतिशत लोकोमोटर अपंगता का शिकार है साथ ही वह इस तरह से बोल नहीं पाती है कि कोई उनकी बात को समझ सकें। उनकी यही परेशानी उनके करियर को नया आयाम देने में मुश्किल साबित हो रही है। एक बड़ी परेशानी यह भी है कि निव्या की आवाज समझ में न आने के कारण स्क्राइब भी कारगर साबित नहीं होता। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने निव्या की समस्या को संज्ञान में लिया है।

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