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यूरोप-अमेरिका में संकट से निर्यात हुआ प्रभावित

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा गुरुवार को लोकसभा में 2011-12 के लिए प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 के दौरान देश का कुल निर्यात 23.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 242.8 अरब डॉलर रहा।

चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही के दौरान निर्यात में 40.6 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन यूरोपीय संकट के चलते निर्यात में अक्टूबर और नवम्बर माह के दौरान कमी दर्ज की गई जबकि यह दिसम्बर 2011 तथा जनवरी 2012 के दौरान इसमें क्रमश: 6.7 और 10.10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-दिसम्बर की अवधि के दौरान पेट्रोलियम और तेल उत्पादों के निर्यात में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई। समीक्षाधीन अवधि के दौरान पेट्रोलियम और तेल उत्पादों में 55 प्रतिशत, रत्न और जेवरात में 38.5 प्रतिशत, इंजीनियरिंग उत्पादों में 21.6 प्रतिशत, सूती कपड़ों में 13 प्रतिशत, इलेक्ट्रानिक उत्पादों में 21.1 प्रतिशत, सिले सिलाए वस्त्रों में 23.7 प्रतिशत और औषधियों के निर्यात में 21.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि दशक के प्रारम्भ में भारत द्वारा निर्यातित वस्तुओं की सूची में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। वर्ष 2000-01 से 2009-10 के दौरान निर्यात में पेट्रोलियम व कच्चे तेल उत्पादों की भागीदारी में 11.8 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि इस दौरान विनिर्माण और प्राथमिक उत्पादों में क्रमश: 11.6 प्रतिशत और 1.1 प्रतिशत की कमी आई है।

चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-जनवरी के दौरान देश का आयात 391.5 अरब डॉलर रहा। यह वित्त वर्ष 2010-11 की समान अवधि के 302.5 अरब डॉलर की तुलना में 29.4 प्रतिशत अधिक है। समीक्षाधीन अवधि के दौरान पेट्रोलियम, तेल और लुब्रिकेंट (स्नेहक) का आयात 38.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 118 अरब डॉलर रहा। इस दौरान सोने और चांदी के आयात में भी 46.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 50 अरब डॉलर रहा।

चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-जनवरी के दौरान व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2010-11 के समान अवधि के 105.9 अरब डॉलर की तुलना में 148.7 अरब डॉलर था।

देश के कुल विदेशी व्यापार में एशिया और आसियान का हिस्सा 2०००-०1 के 33.3 प्रतिशत से बढ़कर 2०11-12 के पूर्वार्ध में 57.3 प्रतिशत हो गया, जबकि यूरोप और अमेरिका का हिस्सा 42.5 प्रतिशत से गिरकर 3०.8 प्रतिशत रह गया। इसकी वजह से भारत को यूरोप और अमरीका में उपजे संकट का सामना करने में सहायता हुई है।

भारत के विदेशी व्यापार की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। 2००7-०8 तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था जो अब तीसरे स्थान पर आ गया। यूनाइटेड अरब अमीरात भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है और उसके बाद चीन का स्थान है।

देश के सेवा क्षेत्र के निर्यात में वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते 2००9-1० के दौरान 9.4 प्रतिशत की गिरावट आने के बाद 2०1०-11 में 38.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह बढ़कर 132.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

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