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सुधार पर केंद्रित बजट के संकेत

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ें और अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालात को देखते हुए इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि शुक्रवार को पेश किया जाने वाला आम बजट सुधार पर केंद्रित हो सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 2010 की शुरुआत से देश भर में हर क्षेत्र में व्याप्त महंगाई को काबू में करने के लिए लगातार मौद्रिक सख्ती के बाद मिली मामूली सफलता से महसूस किया जाने लगा है कि खाद्य महंगाई को दूर करने के लिए आपूर्ति पक्ष की बाधाओं को दूर किए जाने की जरूरत है वहीं अन्य क्षेत्रों में भी प्रतियोगिता को बढ़ावा देकर कीमतों में कमी लाने की नीति की जरूरत समझी जा रही है।

पिछले कुछ समय से कई सुधारवादी कदमों के लिए केंद्र सरकार ने पूरी तत्परता दिखाई है लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण वह उस पर आगे बढ़ने में नाकाम रही। बजट को सरकार सुधारवादी कदमों को आगे बढ़ाने के लिए एक मौके के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।

साल 2008 में आई आर्थिक मंदी से अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह उबर नहीं पाई है। इसकी मार से अभी तक यूरोपीय देश हलकान हैं। ऐसे में सरकार के पास यह सबक है कि वह रियायत पर खर्च बढ़ाने से तौबा करे और ढांचागत सुधार के रास्ते पर आगे बढ़े।

बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर सरकार आगे नहीं बढ़ पा रही है हालांकि उसने इस दिशा में आगे बढ़ने के संकेत जरूर दिए हैं लेकिन उसके समक्ष इस राह में चुनौतियां कम नहीं हैं। क्योंकि विरोधी दलों के साथ उसके सहयोगी दल भी बाधा बने हुए हैं।

नागरिक उड्डयन क्षेत्र में विदेशी विमानन कम्पनियों द्वारा 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मसला लटका हुआ है।

सर्वेक्षण में कहा गया कि वित्तीय घाटा को कम करना ही महंगाई कम करने का एक मात्र उपाय है। ऐसे में रियायत बढ़ाकर सरकार जोखिम नहीं ले सकती है।

सर्वेक्षण में कुछ राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों को भी छुआ गया, जैसे बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, डीजल तथा अन्य मदों में रियायत घटाना।

संसद में सर्वेक्षण पेश करने के कुछ समय बाद संवाददाताओं से वित्त मंत्री ने कहा कि सर्वेक्षण से देश में बेहतर संवाद शुरू होगा, लेकिन सरकार इसकी सभी अनुशंसाओं को पूरी तरह लागू नहीं कर पाएगी।

उन्होंने कहा कि सरकार कुछ अनुशंसाओं पर अमल कर सकती है, लेकिन यह नहीं समझा जाना चाहिए कि बजट में सर्वेक्षण की सभी अनुशंसाएं लागू की जाएंगी।

सर्वेक्षण में डीजल की कीमत बढ़ाने का सुझाव दिया गया और डीजल से चलने वाले वाहनों पर कर बढ़ाने का भी सुझाव दिया गया ताकि इनका दुरुपयोग नहीं हो। ये सभी सुझाव ऐसे हैं जिनसे लोकप्रियता की जगह सुधार के रुझान का पता चलता है।

वैसे भी दिनेश त्रिवेदी के रेल बजट में नौ वर्षो बाद किराया बढ़ाए जाने के फैसले से यह संकेत मिलता है कि सरकार इस बार कुछ कड़ा फैसला लेने के मूड में आ चुकी है।

बहरहाल, रेल बजट में यात्री किराया बढ़ाकर सरकार ने अपने सबसे अहम सहयोगी तृणमूल कांग्रेस से नाराजगी मोल ले ली है और कहा जा रहा है कि तृणमूल के रुख ने उसे आईसीयू में पहुंचा दिया है लेकिन सरकार तृणमूल की कमी को पूरा करने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) की बाट जोह रही है।

सुधारवादी बजट पेश करने पर सरकार के लिए सहयोगी दलों का समर्थन न मिल पाने का जोखिम तो होता ही है लेकिन यह सरकार के लिए एकजुटता व ताकत दिखाने का अवसर भी होता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मौके का उपयोग किस रूप में करती है।

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