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अखिलेश की ताजपोशी से बढ़ेंगी कांग्रेस की चुनौतियां

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के करिश्मे को दांव पर लगाने के बाद भी सफलता न मिलने से निराश कांग्रेस की चिंता राज्य में सपा के नए युवराज की ताजपोशी ने और बढ़ा दी है। कांग्रेस विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल बता कर 2014 में लोकसभा चुनावों के लिए अपनी हालत में सुधार की उम्मीद लगाए बैठे थी। मगर, पार्टी को अब लग रहा है कि उसने यदि अपनी रणनीति व रवैये में बदलाव नहीं किया तो लोकसभा चुनावों में भी उसका यही हश्र होगा।

राज्य से कांग्रेस के एक युवा नेता व केंद्रीय मंत्री ने स्वीकार किया कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना समाजवादी पार्टी का बड़ा दांव है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को समझ नहीं आ रहा कि सपा के इस दांव का उनके पास क्या जवाब है। प्रदेश कांग्रेस के नेता मानते हैं कि विधानसभा चुनावों के दौरान हर वर्ग को साथ लेने के लिए सभी तरह के हथकंडे पार्टी ने अपनाए, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। अब पार्टी को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।

युवा केंद्रीय मंत्री का मानना था कि 38 साल के अखिलेश यादव की ताजपोशी के बाद कांग्रेस के लिए भी राज्य में युवाओं को आगे करना मजबूरी होगी। इसमें पहली चुनौती विधायक दल नेता के चुनाव में ही सामने आने वाली है। प्रदेश अध्यक्ष पद से रीता बहुगुणा के इस्तीफा देने के बाद यह झगड़ा और बढ़ना है।

हालांकि, प्रदेश के नेता दलील दे रहे हैं कि रीता बहुगुणा के इस्तीफे का संबंध उत्तराखंड में उनके सांसद भाई विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी से भी है। उनके अध्यक्ष बने रहने से विजय बहुगुणा की दावेदारी पर असर पड़ सकता था। बावजूद इसके नेता मान रहे हैं कि यूपी में कांग्रेस के लिए हालात अनुकूल करना टेड़ी खीर है। पार्टी अभी पांच-छह माह अखिलेश यादव की प्रशासनिक व राजनीतिक क्षमता को परखना चाहती है। रणनीतिकार मान रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव व उनके परिवार में अखिलेश की दावेदारी को लेकर जिस तरह के मतभेद हैं उनका प्रशासन पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

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