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सब जीत रहे, सबकी सरकार बन रही

अभी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने बाकी हैं लेकिन सरकार बनाने का दावा तेज हो गया है। सभी दलों का दावा है कि उनकी पार्टी को बहुमत मिल रहा है और वे सरकार बना रहे हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि यदि सभी दलों के दावों को मान लिया जाए तो प्रदेश में सभी दल अपनी-अपनी सरकार बनाएंगे। हालांकि सबकी अपनी-अपनी किन्तु-परन्तु के साथ हालांकि भी है। एग्जिट पोल और चुनाव बाद सर्वेक्षणों पर भी खूब चर्चा हो रही है। मौजूदा हालात में सभी दलों का क्या आकलन है, उनके सामने क्या-क्या विकल्प हैं, वे क्या कदम उठा सकते हैं- पेश है हिन्दुस्तान टीम की रिपोर्ट

अभी बहुमत पर ही है भरोसा
लखनऊ, विशेष संवाददाता
चुनावी सर्वेक्षणों की राय से इतर बहुजन समाज पार्टी को यूपी में एक बार फिर अपनी अकेले बहुमत की सरकार बनाने का पूरा भरोसा है।

लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो बसपा को मिली कुल सीटों की संख्या ही उसके अगले सियासी कदम का पैमाना बनेगा।
राजनीतिक प्राथमिकताओं के पैमाने पर देखें तो बसपा के लिए इससे अच्छी बात नहीं हो सकती कि समाजवादी पार्टी की सरकार न बन पाए। दूरगामी राजनीति के तहत उसके लिए यह मुफीद होगा।

तीन-तिकड़म से दूर रहेगी भाजपा
लखनऊ, विशेष संवाददाता
अगर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी कोई बात हो जाए तो दूसरी बात है, वरना बहुमत से दूर रहने पर भाजपा न तो उत्तर प्रदेश में किसी को समर्थन देने जा रही है और न ही किसी तीन-तिकड़म से खुद सरकार बनाने जा रही है।

पिछली बार के 51 के आंकड़े से ऊपर की संख्या तो भाजपा के नेता भी मान रहे हैं लेकिन यह सैकड़ा पहुंचेगा इसमें शक है। भाजपा में लोग यह मान रहे हैं कि कोई करिश्मा न हुआ तो इस बार चुनावी नतीजे कमोबेश 2002 के विस चुनाव जैसी आने की स्थितियां दिख रही हैं।

किन्तु-परन्तु के बीच हालांकि की तलाश
लखनऊ, प्रमुख संवाददाता
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने चुनावी नतीजों के बाद के विकल्पों पर मंथन शुरू कर दिया है। पार्टी सहयोगी रालोद के साथ  बहुमत के आंकड़े को नहीं छू पाएगी, यह पार्टी लगभग मान चुकी है। ऐसे में यूपी में अगला कदम उठाने से पहले पार्टी कई चीजों पर गौर करेगी। जैसे, कुछ माह के अंदर ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं।

केन्द्र सरकार में साझीदार ममता बनर्जी के तेवरों के मद्देनजर यूपीए-2 के बाकी बचे दो साल को खतरों से बचाते हुए 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुटे रहना है।

बहुमत न मिला तो विकल्प कम हैं
यूपी में चुनाव नतीजों के बाद सीटों की संख्या के ही सबसे बड़े सिकंदर होने के मायने समाजवादी पार्टी के लिए बाकियों की तुलना में कुछ ज्यादा हैं। अगर वह साफ-साफ बहुमत हासिल कर ले तो बात अलग वरना पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि 190 सीटों के आसपास का कोई आंकड़ा ही मिलीजुली सरकार के लिए माफिक होगा, वरना मुश्किल होगी।

मुश्किल इसलिए कि अकेली सपा है जिसके पास सरकार बनाने के लिए किसी से मिलने की संभावना के तौर पर सिर्फ कांग्रेस और रालोद गठबंधन है।

छोटे दलों के नेताओं के चेहरे पर खुशी
लखनऊ, वरिष्ठ संवाददाता
एग्जिट पोल में त्रिशंकु नतीजों की भविष्यवाणी ने बड़े दलों की फिक्र भले ही बढ़ा दी हो छोटे दलों के नेता इससे खुश हैं। पांच साल के सूखे के बाद छोटे दलों को फिर से हरियाली दिखने की संभावना बन रही है। छोटे दलों के नेताओं को लग रहा है कि किसी को बहुमत नहीं मिलेगा और यह स्थितियां उनके लिए सत्ता भी लाएंगी और मनमाफिक मलाई भी मिलेगी। 

तकरीबन दो दशक बाद 2007 में छोटे दलों के लिए सूखे का माहौल पैदा हो गया था। क्योंकि पिछले चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत मिल गया था। इस बार संभावित स्थितियों के मद्देनजर जोड़-तोड़ की गणित बैठाने का काम शुरू हो चुका है। इस बार जिन छोटे दलों को ज्यादा उम्मीदें हैं उनमें पीस पार्टी, अपना दल और जन क्रांति पार्टी के नेता कल्याण सिंह के अलावा तृणमूल कांग्रेस और महान दल भी शामिल हैं।

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