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आलोचकों को जमीनी हकीकत भी देखनी चाहिए: प्रणव

सुधारों को बढ़ाने वाला साहसिक बजट पेश नहीं करने को लेकर हो रही आलोचनाओं को खारिज करते हुए वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने रविवार को कहा कि आलोचकों को राजनीतिक हालात को भी समझना चाहिये। एक साक्षात्कार में आम बजट को लेकर व्यक्त की गई प्रतिक्रियाओं पर पूछे गये एक सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे कुछ निराशा हुई है।

हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि आम अपेक्षा यही होगी कि सरकार इस बजट में सभी सुधारात्मक कदम उठा ले क्योंकि 2013 में आम चुनावों से पहले उसके लिए ऐसा करना कठिन होगा। मुखर्जी ने कहा कि कि बजट केवल क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए का आर्थिक सिद्धांत मात्र नहीं है।

उन्होंने कहा कि बजट एक तरह से एक राजनीतिक दस्तावेज भी है क्योंकि इसे संसद की मंजूरी चाहिए होती है। उन्होंने कहा कि अगर बजटीय प्रस्तावों पर गठबंधन सरकार के घटक दलों की मंजूरी नहीं मिलती है तो उनका कार्यान्वयन कठिन होगा।

मुखर्जी ने कहा बजट से पहले घटक दलों से विचार विमर्श संभव नहीं होता क्योंकि प्रस्ताव केवल प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री तक सीमित होते हैं। ऐसे में व्यापक विचार विमर्श तो बजट पेश करने के बाद ही किया जा सकता है और हमें विभिन्न भागीदारों को साथ लेकर आगे बढ़ना होता है।

अप्रत्यक्ष कर प्रस्तावों से कुछ मुद्रास्फीति प्रभाव पड़ने की बात स्वीकार स्वीकारते हुए मुखर्जी ने कहा कि विनिर्माताओं को बोझ आदमी पर डालने से रोकने की कोई प्रणाली उनके पास नहीं है।

साथ ही उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति केवल कर बढ़ने की वजह से ही नहीं बढती है क्योंकि जब मुद्रास्फीति दस प्रतिशत पर थी तो विनिर्माण क्षेत्र की मुद्रास्फीति दो साल के उच्चतम स्तर पर थी। यहां तक कि खाद्य मुद्रास्फीति के शून्य से नीचे आने के बाद भी विनिर्माण क्षेत्र में मुद्रास्फीति का दबाव पिछले महीने तक बना हुआ था। ऐसे में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शुल्क बढ़ने से मुद्रास्फीति दबाव बढेगा, हालांकि वह कुछ मुद्रास्फीति प्रभावों से इनकार नहीं करते।

उन्होंने उत्पाद शुल्क को दो प्रतिशत बढाकर 12 प्रतिशत करने के फैसले का बचाव करते हुये कहा कि 2008 में यह 14 प्रतिशत थी जिसे उन्होंने ही घटाकर दस प्रतिश्त किया था। अब उन्होंने इसे बढा़या है लेकिन 14 प्रतिशत नहीं किया।

मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने सेवा कर तथा उत्पाद शुल्क को समान स्तर पर रखा है। जीएसटी की दिशा में बढ़ने के लिए ऐसा करना जरूरी है। हम यह कहते रहे हैं कि सामान व सेवाओं के मामले में केन्द्र और राज्यों में कर समान होने चाहिए।

उन्होंने कहा इसलिये यह माना जा रहा है कि जब हम जीएसटी की दिशा में आगे बढेंगे तो राज्यों की कर दर भी 12 प्रतिशत के आसपास होगी। ये कुछ विचार हैं जो संसाधन जुटाने की सोच से हटकर हमारे दिमाग में आये हैं। सब्सिडी को अगले तीन साल में दो प्रतिशत से घटाकर जीडीपी का 1.75 प्रतिशत पर लाने के सरकार के फैसले पर मुखर्जी ने कहा कि सब्सिडी सरकार की भुगतान क्षमता पर निर्भर करेगी।

मुखर्जी ने कहा कि आज तक मैं दे सकता था। मैंने सब्सिडी दी है। कल अगर मैं सक्षम नहीं होता हूं तो भुगतान नहीं करूंगा। यह सीधी सी बात है। इसलिए हमें इसकी कोई सीमा तो तय करनी ही होगी। साथ ही उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में सरकार को जो भी फैसले करने होंगे उसके लिए उन्हें अन्य भागीदारों को भी साथ लेना होगा और इसके लिए व्यापक परामर्श की जरूरत होगी।

उन्होंने कहा कि अगर कोई कहता है कि कुछ मत करो और लोगों से कर लेकर सब्सिडी दो तो मुझे फैसला करने से पहले सभी संबंद्ध पक्षों की राय लेनी होगी ताकि कल कोई यह न कहे कि यह आपका निर्णय था, हमसे राय नहीं ली गई। मुखर्जी ने कहा कि सरकार को सभी पक्षों के साथ व्यापक विमचार विमर्श कर उन्हें साथ लेना है। यह बजट प्रक्रिया के जरिये संभव नहीं है, इसे बजट बाद ही किया जा सकता है।

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