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...तो बुंदेलखण्ड बन जाएगा 'रेगिस्तान'

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही केंद्र सरकार की केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना को हरी झंडी दे दी हो, लेकिन बुंदेलखण्ड में इसका व्यापक विरोध शुरू हो गया है। भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय और राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण जहां इसे फायदे का सौदा बता रहा है, वहीं यहां के किसान और बुद्धिजीवी इस परियोजना से बुंदेलखण्ड के 'रेगिस्तान' बनने की आशंका जाहिर कर परम्परागत सिंचाई के संसाधन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

भारत सरकार के राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने जल सूचना अधिकार अधिनियम में केन-बेतवा नदी गठजोड़ को बुंदेलखण्ड के लिए फायदा का सौदा बताते हुए कहा है कि इस परियोजना से उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखण्ड में सिंचाई के लिए 1०74 मिलियन घनमीटर पानी केन बेसिन से लिंक नहर में डाला जाएगा।

बताया गया है कि 'वर्ष 2050 तक की सभी गणना एवं उसके लिए प्रावधान रखने के बाद बांध स्थल पर 4443 मिलियन घनमीटर (एमक्यूएम) पानी बचता है। केन नदी पर प्रस्तावित डोढ़न बांध के नीचे 3005 मिलियन घनमीटर पानी की जरूरत है। इसमें उत्तर प्रदेश को 1600 और मध्य प्रदेश को 1405 मिलियन घनमीटर पानी दिया जाएगा।

इसके अलावा कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ भी गिनाए हैं। मसलन, मध्य प्रदेश के केन कमान क्षेत्र में 3.23 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, ऊपरी बेतवा कछार में प्रस्तावित परियोजनाओं के कमान क्षेत्र में 0.62 लाख हेक्टेयर भूमि में वार्षिक सिंचाई, उत्तर प्रदेश के केन कमान क्षेत्र के 2..52 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वार्षिक सिंचाई का स्थायीकरण, दो पावर हाउस से 78 मेगावाट बिजली उत्पादन, पेयजल सुविध और जलाशयों में मत्स्यपालन जैसे लाभ बताए गए हैं।

लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण के इस कथित फायदे से इत्तेफाक नहीं रखते। मैग्सेसे पुस्कार से सम्मानित जल-पुरुष राजेंद्र सिंह, अरुंधती राय, मेधा पाटकर, भारतेंदु प्रकाश, हिमांशु ठाकुर (सैंड्रम), सिराज केशर (इंडिया वाटर पोर्टर) व सचिन जैन जैसे शोधकर्ता इसे पहले ही बुंदेलखण्ड का प्राणांत बता चुके हैं।

इन सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राजस्थान जैसे क्षेत्रों को ध्यान में रख कर केंद्र सरकार को नदियों को जोड़ने की सलाह दी थी। लेकिन इस परियोजना से बुंदेलखण्ड पानीदार कम, बाढ़ग्रस्त और 'रेगिस्तान' ज्यादा बनेगा।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य और राष्ट्रीय जल बिरादरी के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने गत शुक्रवार को कहा, ''देश में इसके पहले भी नदियों कोजोड़ने की कई परियोजनाएं बनाई गईं, लेकिन उनसे कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि कावेरी नदी जल विवाद का जन्म जरूर हुआ है। बुंदेलखण्ड को पानीदार बनाने के लिए वर्षाजल को संचय कर पुराने परम्परागत जल स्रेतों और सिंचाई संसाधनों को बढ़ावा देना होगा। केन और बेतवा को जोड़ने से या तो बाढ़ की विभीषिका का सामना करना होगा, या फिर रेगिस्तान जैसे हालात पैदा हो जाएंगे।''

'नदी बचाओ-तालाब बचाओ' आंदोलन के संयोजक सुरेश रैकवार कहते हैं, ''इस परियोजना को अंतिम रूप मिल जाने से जहां विस्थापितों की संख्या बढ़ेगी, वहीं वन्य जीवों के रहने का ठौर-ठिकाना खत्म हो जाएगा। नदी गठजोड़ महज बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश करने के लिए किया जा रहा है।''

प्रवास सोसायटी नामक सामाजिक संगठन के आशीष सागर का कहना है, ''केन और बेतवा सम्पर्क परियोजना न सिर्फ पानी के संकट को भयावह करेगी, बल्कि हजारों वनवासियों और दलित परिवारों के विस्थापन का भी एक बड़ा कारण बनेगी।''

उन्होंने कहा, ''नदियों को जोड़ने की परियोजना हर देश-काल, भौगोलिक क्षेत्र में भिन्न-भिन्न हैं। वहां की परिस्थितियां जनसंख्या की बसावट संस्कृति व प्रकृति भी अलग ही होती है, आखिर नदियों के जोड़ने की प्रयोगशाला बुंदेलखण्ड को ही क्यों बनाया जा रहा है?''

बुंदेलखण्ड भविष्य विकास परिषद के पुष्पेंद्र भाई कहते हैं ''केन-बेतवा गठजोड़ बुंदेलखण्ड को अकाल में झोंकने की योजना है। इस बारे में प्रधानमंत्री को पहले ही मांगपत्र दिया जा चुका है। यहां खेतों की मेड़बंदी, तालाब और कुंओं की जरूरत पूरी कर किसानों को सीधे सिंचाई के संसाधन मुहैया कराए जाने चाहिए।''

बड़ोखर गांव के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह इस परियोजना को प्रकृति विरोधी मानते हैं। उनका कहना है, ''यह किसी भी दृष्टि से हितकारी नहीं है, जितनी राशि इस परियोजना में खर्च की जा रही है, उससे बड़ी संख्या में छोटे सिंचाई संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं और प्राकृतिक उपायों को बढ़ावा दिया जा सकता है।''

प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके बुजुर्ग समाजवादी चिंतक जमुना प्रसाद बोस कहते हैं, ''केन-बेतवा गठजोड़ बुंदेलखण्ड और खास कर बांदा के लिए न सिर्फ घाटे का सौदा है, बल्कि यह परियोजना क्षेत्र को रेगिस्तान जैसा बना सकती है। सरकारों को ऐसी किसी भी योजनाओं से बचना चाहिए।''

अस्सी के दशक में बांदा सदर से कांग्रेस से विधायक रहे प्रो. चंद्रप्रकाश शर्मा कहते हैं, ''सरकार की मंशा जब खेत का पानी खेत में रखने की है तो ऐसे में नदियों को जोड़ने और केन का पानी बेतवा में डालने का क्या मतलब है? केन-बेतवा गठजोड़ से क्षेत्र में और सूखा पड़ेगा।''

केंद्र सरकार की मंशा भले ही बदहाल बुंदेलखण्ड को इस परियोजना से लाभ दिलाने की रही हो, पर क्षेत्र में इसको लेकर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं।

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