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झारखण्डे राय की विरासत आगे बढ़ाने वाले कहां हैं

पूर्वांचल में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में अग्रणी रहे झारखण्डे राय की सादगी देखनी हो तो उनके घर जाइए। घोसी से सात बार सांसद व विधायक रहे झारखण्डे राय का घर अब लगभग खंडहर में तब्दील हो चुका है। ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले राय साहब के बारे में कहा जाता है कि जब नई दिल्ली में उनका निधन हुआ तो उनके पुत्र अशोक राय को चंदा लगाकर शव को पैतृक गांव तक लाना पड़ा। शुभचिंतकों एवं मित्रों ने बैंक खातों को खंगाला तो वहां भी कुछ नहीं मिला। आज उनका परिवार भी तंगहाली से गुजर रहा है।

झारखंडे राय आजीवन किसानों और मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे। पूर्वाचल के सभी जिलों में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार ही उनके जीवन का मिशन रहा। लोकसभा में उन्होंने जब भी कोई मुद्दा उठाया, वह गरीबों और किसानों से ही जुड़ा रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वह किसान सभा की गतिविधियों से सक्रियता से जुड़े। सामन्तों और ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांव-गांव में किसानों को एकजुट किया। 1939 में गाजीपुर में किसान सभा के कार्यालय से पुलिस ने प्रतिबंधित साहित्य रखने के आरोप में पकड़ लिया।
1940-41 में गाजीपुर में देवरीकांड हुआ, जिसमें झारखण्डे राय को नजरबंद कर दिया गया। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जमींदार परिवार की थी। इसके बावजूद उन्होंने जमींदारी उन्मूलन के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। इसके लिए जय बहादुर सिंह व सरजू पाण्डे के साथ किसान सभा के जरिए बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ा। आंदोलन को आगे बढ़ाया। किसानों व आम लोगों में वह काफी लोकप्रिय थे। यही वजह थी कि वह लगातार चुनाव जीतते रहे।

67 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में उन्हें खाद्य मंत्री बनने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने गन्ना किसानों को लाभ दिलाने के लिए पूर्वाचल में चीनी मिलों की स्थापना का प्रयास किया। किसानों को अधिक से अधिक गन्ने की खेती के लिए प्रेरित किया। दिग्गज कम्युनिस्ट नेता जयबहादुर सिंह के निधन के बाद पूर्वाचल में लाल झण्डे की कमान उनके हाथ में आ गई थी।

उनका जीवन सादगी भरा था। अपना काम खुद करना उन्हें पसंद था। यहां तक कि अपना कुर्ता-धोती भी वह खुद ही धोते थे। सूखने पर उसे तह करके तकिया के नीचे रख देते थे और एक दिन बाद उसे पहनते थे। किताबों से उन्हें बहुत लगाव था। काम करने के बाद मिलने वाला समय किताबों को देते थे। क्रान्तिकारियों पर कुछ किताबें भी लिखी थीं। इतना ही नहीं वह कार्यकर्ताओं को किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। झारखण्डे राय को चिट्ठियां लिखने का भी शौक था। मित्रों को चिट्ठी लिखते समय वहां की जगह का नाम जरूर डालते थे। अगर ट्रेन में सफर करते समय चिट्ठी लिखते तो ऊपर डालते ट्रेन से चिट्ठी..। लखनऊ में पेपर मिल कॉलोनी में रहते थे तो बिना किसी तामझाम के लोगों से मिलते थे। लोगों की मदद करने में वे कोई संकोच नहीं करते थे। उन्होंने कभी भी उसूलों से रत्ती भर समझौता नहीं किया।

जन्म: 1902 में अमिला गांव में
निधन: 18 मार्च 1987 को नई-दिल्ली में
शिक्षा: इंटर पास

राजनीतिक सफर

1952, 57, 62 और 67 में घोसी से विधायक चुने गए। इस दौरान खाद्यमंत्री बनने का मौका मिला।
1967 के उपचुनाव में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। 77 में पराजित हुए
1980 में दोबारा लोकसभा में जाने का मौका मिला
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कई बार गिरफ्तार हुए

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