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अब गोल्ड मेडल है इस सिलेब्रिटी का सपना 

अब गोल्ड मेडल है इस सिलेब्रिटी का सपना 

त्रिपुरा की रहने वाली 22 वर्षीया दीपा करमाकर ने रियो ओलंपिक के लिए जिम्नास्टिक्स में अपनी जगह बनाई। ओलंपिक में अपनी जगह बनाने वाली वे पहली भारतीय महिला हैं। इतना ही नहीं, बीते 52 सालों में ‘क्वाड्रेनियल एक्स्ट्रावेगेंजा’ के लिए ओलंपिक में अपनी जगह बनाने वाली वे पहली भारतीय भी बन गई हैं। इससे पहले वर्ष 1964 के टोक्यो ओलंपिक में भारत के कुछ पुरुष जिम्नास्ट्स को मौका मिला था। दीपा कलात्मक जिम्नास्टिक्स में क्वालिफाई करने वाली व्यक्तिगत सूची में 79वीं जिमनास्ट बनी हैं। इतिहास रचने वाली दीपा करमाकर ने एक और उपलब्धि हासिल की, उन्होंने टेस्ट इवेंट में महिलाओं के वॉल्ट्स के फाइनल में स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। 

9 अगस्त 1993 में अगरतला में दीपा का जन्म हुआ था। इस ऐतिहासिक तिथि पर लोग गांधी जी को भी याद करते हैं। क्योंकि 9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने अंग्रेजो के खिलाफ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ चलाया था। दीपा ने 2007 में जूूनियर नेशनल चैंपियनशिप जीती। 2014 में ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में क्वालिफाई करने के बाद दीपा के पैर काफी सूज गए थे। सबने वॉल्ट के लिए मना किया, पर दीपा ने अच्छा प्रदर्शन करके ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। अब तक उन्होंने कुल 77 पदक जीते हैं, इनमें से 67 स्वर्ण पदक हैं। वह अर्जुन अवॉर्ड से भी नवाजी जा चुकी हैं। जिम्नास्टिक्स की जिस विधा प्रोडुनोवा वॉल्ट में वह प्रदर्शन करती हैं, वह सबसे मुश्किल विधा है। संसार में केवल पांच महिलाएं हैं, जिन्होंने ‘प्रोडुनोवा वॉल्ट’ में सफल प्रदर्शन किया है, उन्हीं में एक दीपा करमारकर भी हैं। प्रधानमंत्री के साथ-साथ कई बड़ी-बड़ी हस्तियों ने दीपा को बधाई संदेश भेजे हैं। दिल्ली एयरपोर्ट पर व त्रिपुरा पहुंचने पर लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। खेल मंत्रालय ने दीपा को टारगेट ओलंपिक स्कीम (टॉप्स) में शामिल किया है। अब उन्हें प्रशिक्षण के लिए 30 लाख रुपए दिए जाएंगे। 

दीपा के कोच बिस्वेस्वर नंदी ने कहा, ‘दीपा का एक गलत मूव उसकी मृत्यु का कारण बन सकता है। इसमें बहुत रिस्क लेना होता है। दीपा बहुत मेहनती है, जो ठान लेती है, उसे जरूर पूरा करती है। इसी तरह हम सभी बच्चों से कहेंगे कि हमेशा अपने कोच की बात मानें। प्रैक्टिस पूरे मन से करो।’

दीपा बहुत छोटा और प्यारा नाम है पर उनके घर वाले ज्यादा प्यार उडेलते हुए उन्हें गुड्डू और सीमा नामों से बुलाते हैं। उनकी मम्मी गौरी करमाकर और बड़ी बहन ने कभी भी उन्हें घर के कामों में उलझाए नहीं रखा, उन्हें जिमनास्टिक्स की प्रैक्टिस के लिए पूरा समय दिया। उनके पिता दुलाल करमाकर स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) में वेट लिफ्टिंग के कोच थे। दीपा ने साढ़े पांच साल की उम्र से शोमा नंदी से जिम्नास्टिक्स सीखना शुरू कर दिया था। उन्होंने ही उनकी जिम्नास्टिक्स की बेस बनाई थी। तब दीपा को ‘पॉस्चुरल डिफॉर्मिटी’ थी, उसके पैर सपाट (फ्लैट फुट) थे। ऐसे पैरों के कारण उछलने, कूदने, दौड़़ने व पैर जमाने में काफी कठिनाई आती है। दीपा के कोच बिस्वेस्वर ने उन्हें अलग से समय देकर प्रैक्टिस कराई। दीपा की कड़ी मेहनत के कारण सपाट पैरों ने कर्व ले लिया। दीपा ने कभी भी अभावों को सामने नहीं आने दिया। ‘विवेकानंद व्यामागार’ जहां उन्होंने पहली ट्रेनिंग ली थी, वहां मैट पर प्रैक्टिस करनी होती थी। बारिश के दिनों में वहां पानी भर जाता था। कॉकरोच चलते थे, चूहे आ जाते थे। जब उन्होंने पहली बार जिम्नास्टिक्स स्पर्धा में हिस्सा लिया था, तो उनके पास जूते तक नहीं थे, उन्होंने मांगकर जूते पहने थे। और ढीली-ढाली ड्रेस पहनकर स्पर्धा में हिस्सा लिया था। मगर अब जहां वह दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में प्रैक्टिस करती थीं, वहां खास इंतजाम किए गए थे। नई फोम पिट लगाई गई थी। 

पढ़ाई में वह सामान्य छात्रा रही हैं। उन्होंने ‘उडान अदोई नगर नाजरुल समिति विद्यालय’ से स्कूल की पढ़ाई की। त्रिपुरा युनिर्विसटी से बी.ए. किया, अब पॉलीटिकल साइंस में पोस्ट ग्रैजुएशन कर रही हैं। दीपा अपना आइडल स्विट्रजरलैंड के जिम्नास्ट स्टेनग्रुबर गुलिया और अमेरिका के सिमोन बाइल्स को मानती हैं। 
दीपा का कहना है, ‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता है। जीवन में रिस्क तो लेना ही पड़ता है। बहुत कुछ जीवन में छोड़ना पड़ता है। जैसे मैं जिमनास्टिक्स में इतना डूब चुकी हूं कि कोई फिल्म नहीं देखती, कोई हॉबी पूरी नहीं करती। मैं प्रतिदिन सात घंटे जिमनास्टिक्स की प्रैक्टिस करती हूं। कोच की हर बात ध्यान से सुनती हूं, चाहकर भी चॉकलेट और पेस्ट्री नहीं खाती। किसी भी जिम्नास्ट को वसा, मीठा ज्यादा नहीं लेना चाहिए। रोटी, चावल, मीट, चिकन, अंडे, दूध, फल, सब्जियां, सूखे मेवे खाती हूं। वैसे मुझे चिली चिकन, चाउमिन, मंचूरियन आदि सब चाइनीज खाने पसंद हैं। मोर को देखना बहुत अच्छे लगते हैं। अब लोगों को पता लग गया है कि जिम्नास्टिक्स में पुरुषों ने अपना स्थान बनाया है, तो महिलाएं भी इसमें नाम कर सकती हैं। एक समय था जब लोग इसे सर्कस समझते थे। मैं स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया, त्रिपुरा राज्य सरकार, जिम्नास्टिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया व अपने बहुत अनुभवी कोच की शुक्रगुजार हूं। आज उन्हीं की बदौलत मैं यहां तक पहुंची हूं। अब मैं कहीं भी जाती हूं तो किसी फिल्मी सितारे की तरह लोग मुझसे ऑटोग्राफ मांगते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगता है। त्रिपुरा जैसे गरीब और छोटे से राज्य में मैंने जिस उम्र में देश का नाम रोशन किया है, वहां इस उम्र में आमतौर पर लड़कियों की शादी कर दी जाती है। पर मेरे मम्मी-पापा ने मुझे सपने पूरे करने का पूरा मौका दिया है। अब मैं शादी भी उस इनसान से करना चाहूंगी, जो मुझे जिम्नास्टिक्स की दुनिया में आगे बढ़ने से न रोके। रियो ओलंपिक में पदक जीतने के लिए कड़ी मेहनत करूंगी। अब गोल्ड मेडल जीतना ही मेरा सपना है।’’

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  • Web Title:olympics is the biggest dream of deepa karmakar