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शब्दों की माला में समय को पिरोते 80 के हुए दूधनाथ

शब्दों की माला में समय को पिरोते 80 के हुए दूधनाथ

दूधनाथ सिंह हिन्दी साहित्य का वह चेहरा हैं जो अपनी बात बेलाग किन्तु सुचिंतित तरीके से कहते हैं। समय पर समय की बात करते हैं। चीजों को अलग और सटीक तरीके से देखते हैं, फिर तफ़्सील से उसकी व्याख्या करते हैं। विरुद्धों के प्रति आक्रामक होते हैं तो कम बोलते हैं, मगर प्रिय विषय पर सिलसिलेवार नदी की तरह बहते हैं। पर किसी भी हालत में कहन की धार कमतर नहीं होती। वह इसलिए कि उनके लेखन और चिंतन की बुनियाद अपनी सांस्कृतिक जमीन में गहराई तक धंसी है। शहर इलाहाबाद को गर्व है कि 20वीं और 21वीं सदी के साहित्य लेखन का यह प्रतिनिधि रचनाकार सुबह-शाम उसकी गंगा-जमुनी तहजीब को सींचता-संवारता है।

17 अक्टूबर 1936 में बलिया के सोबन्धा गांव में जन्मे दूधनाथ सिंह की पहली कहानी 'तुमने तो कुछ नहीं कहा' 1958 में धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी। महज 22 साल से शुरू हुई इस कथायात्रा ने जल्द ही अपनी धार पकड़ ली। बनावट और बुनावट में नई कहानी को नकारते हुए साठोत्तरी कहानी की नींव डाली तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने लेखन को सही साबित करने के लिए साथियों संग दिग्गज संपादक भैरव प्रसाद गुप्त के सामने डटकर खड़े रहे। 1960-62 के दौरान आजीविका के फेर में कोलकाता में रहे। 1966 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए तो फिर इसी शहर के होकर रह गए।

दूधनाथ सिंह महज एक कथाकार नहीं हैं, बल्कि प्रखर अध्येता, आलोचक, कवि और चिंतक भी हैं। अपने पूर्ववर्तियों पर क्लासिकल काम के साथ ही समय-समय पर अपने समकालीन रचनाकारों पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। नए लेखन पर करीबी नजर रखने वाले दूधनाथ सिंह जुझारू और साहसी संगठनकर्ता के तौर पर ख्यात हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर वैचारिक विमर्श की अगुवाई करते हैं। समाज, राजनीति, संस्कृति और विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे बदलावों और कार्यों को परखते और गुनते रहते हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों के जनविरोधी कार्यों और नीतियों का विरोध करने वालों में हमेशा आगे रहते हैं।

अमरकांत, मार्कण्डेय और शेखर जोशी के अभिभावकत्व को बरकरार रखते हुए दूधनाथ सिंह ने सक्रियता और सार्थकता के 80 बरस पूरे कर लिए हैं। उनके होने से साहित्य में शहर की धमक कायम है। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर उनके पाठक, प्रशंसक और शिष्य उनका 80वां जन्मदिन मना रहे हैं। शहरवासियों की भी कामना है कि शब्दों की माला में समय को पिरोते हुए दूधनाथ सिंह सौ बरस पूरे करें और अपनी छत्रछाया में इलाहाबाद की रचनाशीलता की अगुवाई करते रहें।

प्रमुख कृतियां

कहानी संग्रह

1. सपाट चेहरे वाला आदमी

2. सुखान्त

3. प्रेमकथा का अंत न कोई

4. माई का शोकगीत

5. धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

6. तू फू

7. जलमुर्गियों का शिकार

उपन्यास

1. आखिरी कलाम

2. निष्कासन

3. नमो अन्धकारं

कविता संग्रह

1. अपनी शताब्दी के नाम

2. एक और भी आदमी है

3. युवा खुशबू

4. तुम्हारे लिए

5. सुरंग से लौटते हुए

नाटक

1. यमगाथा

आलोचना

1. निराला : आत्महंता आस्था

2. महादेवी

3. मुक्तिबोध : साहित्य में नई प्रवृत्तियां

संपादन

1. तारापथ (पंत)

2. भुवनेश्वर समग्र

3. दो शरण (निराला)

4. एक शमशेर भी है

5. ओट में खड़ा मैं बोलता हूं (केदारनाथ अग्रवाल)

6. सात भूमिकाएं (महादेवी)

संस्मरण

1. लौट आ ओ धार

सम्मान/पुरस्कार

1. भारत भारती पुरस्कार

2. शरद जोशी सम्मान

3. साहित्य भूषण

4. कथाक्रम सम्मान

5. निदेशक, निराला सृजनपीठ, भोपाल

6. फेलो, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

7. अतिथि लेखक, वर्धा विश्वविद्यालय

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  • Web Title:Renowned hindi writer Dudhnath Singh turned to 80