DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

डिग्री का बवाल

नेता या राजनीतिज्ञ बनने के लिए अभी तक कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है। फिर भी हमारे नेतागण दिखावा व जनता को गुमराह करने से बाज नहीं आते। साथ ही, यह विचारणीय तथ्य है कि खस्ताहाल शिक्षा प्रणाली की बदौलत फर्जी प्रमाण-पत्र इन लोगों को बड़ी सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। वहीं, आम आदमी को अर्दली की नौकरी के लिए भी कितने पापर बेलने पड़ते हैं। दिल्ली सरकार में मंत्री रह चुके एक व्यक्ति का गलत कदम पूरी व्यवस्था की साख को धूमिल करता है। अब तो पता नहीं कि हमारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री की डिग्री कैसी है?
कजरी मानसी ऐश्वर्यम, गुड़गांव
kmaishwaryam@gmail.com

पत्रकार पर हमला

शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या एक निंदनीय अपराध है। यह देश के चौथे स्तंभ पर बड़ा हमला है। इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद प्रदेश सरकार अपराधियों को जेल भेजने की बजाय उनके घिनौने अपराध पर परदा डाल रही है। प्रदेश सरकार अपने नेताओं की झूठी ईमानदारी के डंके पीटती है, लेकिन गुंडागर्दी पूरे राज्य में है। यही कारण है कि एक के बाद एक पत्रकार पर हमला हो रहा है। पुलिस व्यवस्था आम आदमी की रक्षा करने की बजाय उनको झूठे आरोपों में फंसाती है, जबकि भ्रष्ट नेताओं की सुरक्षा में जी-जान से जुटी है। नेताओं को यह समझना चाहिए कि पत्रकार मात्र माध्यम होता है, जो अपनी खबरों से लोकतंत्र की रक्षा करता है। अगर इसी तरह पत्रकारों पर जानलेवा हमले होते रहे, तो उत्तर प्रदेश के लोकतांत्रिक ढांचे को ढहने में बहुत देर नहीं लगेगी। देखा जाए, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह भ्रष्ट नेताओं और बदतर पुलिस व्यवस्था के बीच फंस गई है और आम आदमी चौतरफा मार से परेशान है।
पंकज भारत, मेरठ, उत्तर प्रदेश
pba1712.pb@gmail.com

नकल पर लगे रोक

सभी स्तर की परीक्षाओं की गिरती गुणवत्ता पिछले तीन दशक से हमारे देश की एक बड़ी समस्या बनी हुई है। इसके कितने सारे उपाय किए गए, लेकिन वे सभी नाकाफी साबित हुए। शिक्षा की इस दयनीय स्थिति का कोई एक कारण नहीं है। दरअसल, बदलते माहौल और विद्यार्थियों की बदली जरूरत को जब तक हम नजरअंदाज करते रहेंगे, तब तक हमारी शिक्षा पद्धति 19वीं सदी के संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाएगी। सबसे बड़ी चिंता का विषय है, परीक्षार्थी और व्यवस्था के साथ-साथ अभिभावकों का इस गोरखधंधे में भागीदार हो जाना, जिसकी वजह से यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध बन चुका है। इस पर लगाम लगाने के लिए कड़े कानून के साथ छात्रों और अभिभावकों में जागरूकता भी पैदा करनी होगी। दूसरी ओर, पठन-पाठन और परीक्षाओं को केवल निरीक्षक स्तर के भरोसे नहीं रखना होगा। इसके लिए शिक्षा विभाग के शीर्ष नौकरशाहों और संबंधित मंत्रालय को गंभीरता से विचार करना होगा।
रमेश सिन्हा, गुड़गांव
ramesh_sinha04@yahoo.com


गर्त में शिक्षा

कोई भी देश ज्ञान से तरक्की करता है। कोई भी व्यक्ति अपना, अपने परिवार और समाज का विकास करता है, उसी ज्ञान से, जो उसने छात्र-जीवन में पाया होता है। लेकिन अब शिक्षा के नाम पर लोगों ने डिग्रियां बांटने की दुकान खोल रखी है। शिक्षा लोगों को मिल रही है, लेकिन उसकी गुणवत्ता बिल्कुल जीरो है। सरकारी स्कूलों का हाल किसी से छिपा नहीं है। जहां बच्चे पढ़ने पर कम, मिड-डे मील पर ज्यादा ध्यान देते हैं, वहां क्या हाल होगा? कुछ स्कूल तो ऐसे हैं, जहां मास्टर सारी साफ-सफाई बच्चों से ही कराते हैं, क्योंकि स्कूल में सफाई कर्मचारी का पद है ही नहीं। शिक्षा का बाजारीकरण अपने चरम पर है। फर्जी डिग्रियों का गोरखधंधा दिन दुनी, रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। कहीं पर पेपर लीक हो रहा है, तो कहीं खुलेआम पर्चियां परोसी जा रही हैं, जिससे कई मेधावी बच्चों के परिश्रम पर पानी फिर रहा है।
सुनील प्रेमी, सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा
sunilpremilc@gmail.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:डिग्री का बवाल