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उम्मीद के विपरीत

बीजेपी के सपने को तो देश की जनता ने पूरा कर दिया। मगर जो सपना बीजेपी ने जनता को दिखाया था, उसके अंकुर भी कहीं फूटते नहीं दिखाई दे रहे। पिछले एक साल में बीजेपी सरकार ने जो कुछ किया, अगर यही सब अगले चार साल तक चलता रहा, तो 2019 के आने तक भारत पाषाण-युग में प्रवेश कर चुका होगा। बीजेपी के नेताओं को कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है, तो वे कांग्रेस द्वारा किए गए अच्छे काम की जड़ों में भी मट्ठा डाल रहे हैं। मंत्रियों की निगाह देश के निर्माण में नेहरूजी की भूमिका पर नहीं, बल्कि उनकी छवि धूमिल करने पर टिकी है। बीजेपी के नेताओं को तो इंदिरा गांधी का वह पराक्रम भी प्रभावित नहीं करता, जिससे इस महादेश का नक्शा बदला। सरकार ने तय सामाजिक कार्यक्रमों में भारी कटौती की है। सबको जोड़ दिया जाए, तो करीब पौने दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कटौती हुई है।
आनंद गोयल, स्टेट बैंक कॉलोनी, दिल्ली-09

भूल गए वादे

प्राय: सभी राजनीतिक दल चुनाव के पहले बड़े-बड़े लुभावने वादों का अंबार लगा देते हैं। आम जनता और झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले इन वादों के बहकावे में आकर उस राजनीतिक दल को वोट देते हैं, जिसने सबसे लुभावने वादे किए। जैसे ही वह दल चुनाव जीतता है, अनेक बहाने बना अपनी असमर्थता व्यक्त करने लगता है। कभी केंद्र से सहायता न मिलने का बहाना, तो कभी मानसून के देर से आने का बहाना, कभी प्राकृतिक आपदा की बात, तो कभी कुछ और। इस तरह से सारे राजनीतिक दल दोषी हैं। भाजपा ने कालेधन को देश में लाने का वादा किया था और यह कहा गया  था कि प्रत्येक गरीब के खाते में 15 लाख रुपये जाएंगे। लेकिन अब वित्त मंत्री कहते हैं कि  काले धन को देश में लाना इतना आसान नहीं है। ऐसे में, 15 लाख गरीब को कहां से मिलेंगे? आम आदमी पार्टी भी अपने वादों से मुकर गई। कभी केंद्र से अनुदान न मिलने का बहाना, तो कभी सभी मसले केंद्र के पल्ले डाल देना।
ब्रजमोहन, पश्चिम विहार, नई दिल्ली

जब काल भी रोया होगा
   
बीते दिनों एक संपादकीय 'एक खामोश मौत' पढ़ा। हमें गर्व होता है, उन अस्पतालकर्मियों पर, जिन्होंने न दिन देखा, न रात और बस अरुणा शानबाग की सेवा में लगे रहे। एक वकील ने उनकी इच्छामृत्यु की याचिका भी लगाई थी, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। उन्हें इस नारकीय यातना तक पहुंचाने वाला अपराधी तो सजा काटकर बाहर आ गया, पर वह ताउम्र नरक को जीती रही। लंबे समय तक पीड़ा भोगने के बाद वह दुनिया को अलविदा कह गईं। वह एक खामोश मौत मरीं, लेकिन अपने पीछे छोड़ गईं ढेरों सवाल। ऐसे सवाल, जिनके जवाब किसी के पास नहीं हैं। और इनके जवाब के लिए वर्षों इंतजार तक करना पड़ सकता है। ऐसे घिनौने अपराधों की सजा तय करने से पहले व्यवस्था को सोचना होगा।
इंद्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैंप, दिल्ली 9

तभी आएंगे अच्छे दिन

केंद्र और राज्य सरकारों के खजानों पर सबसे पहला नैतिक हक देश व राज्यों के कमजोर वर्ग का होता है। विकास काम इसी कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए होना चाहिए। किंतु खेद है कि पिछले कई वर्षों से सरकारी खजानों का दुरुपयोग हो रहा है अथवा किया जा रहा है। अत: केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और राज्य सरकार के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वे बिजली, पानी, पेट्रोल, सरकारी वाहनों आदि का दुरुपयोग न करके सरकारी धन का बचत करें और सभी कामों में फिजूलखर्ची बंद करके नैतिकता का परिचय दें। नेतागण और बड़े सरकारी अधिकारी सरकारी धन की बचत करेंगे, तभी सभी क्षेत्रों में कम खर्च की प्रवृत्ति पैदा  होगी, देश का खजाना भरेगा और बचत किए हुए धन से गरीब तबका का भला और पूरे देश का विकास हो पाएगा। तभी आएंगे अच्छे दिन। पर क्या हमारे नेता ऐसा कर पाएंगे?
नेमीचंद छाबड़ा, जयपुर, राजस्थान

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