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योजना का हाल

मोदी सरकार की अटल पेंशन योजना अच्छी है। इससे लोग अपना बुढ़ापा सुरक्षित कर सकते हैं। सरकार इस स्कीम को बढ़ावा देने के लिए निरंतर अखबारों और चैनलों में विज्ञापन दे रही है, ताकि आम लोगों तक इसकी जानकारी पहुंच सके। लेकिन सरकारी स्कीम का जमीन तक पहुंचते-पहुंचते क्या हश्र होता है, इसका ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। नई दिल्ली जैसे क्षेत्र में भी बैंकों के पास अभी फॉर्म उपलब्ध नहीं हैं। अखबारों में छप रहे विज्ञापनों में फॉर्म देखकर जब बैंक में पता किया, तो मालूम चला कि अभी तक इस योजना का फॉर्म उपलब्ध नहीं है। फॉर्म कब तक मिल पाएगा, यह पूछने पर संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सरकार को लगता है कि लोग जागरूक नहीं हैं, लेकिन जो जागरूक हैं, उन्हें लगता है कि यह सरकार सोई हुई है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह विज्ञापन देने के साथ यह भी सुनिश्चित करे कि बैंकों में यह योजना सही तरीके से लागू हो।
मोहन सूर्यवंशी
emsmohan@gmail.com

मैगी के अलावा

जिस तत्परता के साथ केंद्र और राज्य सरकारों ने मैगी पर प्रतिबंध लगाया है, क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि इतनी ही तत्परता सिगरेट, तंबाकू और शराब को प्रतिबंधित करने में भी दिखाई जाएगी? अभी तो बहस इस बात पर चल रही है कि सिगरेट के पैकेट के 80% भाग पर चेतावनी छापी जाए या 85% भाग पर। यदि मात्र चेतावनी पढ़कर ही लोग नशा करना छोड़ देते, तो भारत कब का नशा मुक्त राष्ट्र बन चुका होता। अगर वास्तव में सरकार की मंशा लोगों के स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही नेक होती, तो वह चेतावनी की बजाय नशीले पदार्थों पर पूरी तरह से पाबंदी लगाती। दरअसल, इनसे प्राप्त होने वाला मोटा राजस्व सरकार को कड़े कदम उठाने से रोकता है। पर इन व्यसनों के सेवन से होने वाली बीमारियों के इलाज पर जो बेहिसाब धन खर्च होता है, क्या उसकी कोई सुध है? और फिर अस्वस्थ मानव संसाधनों का निर्माण करके हम किस प्रकार आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा कर सकते हैं? शायद, हमारी सरकार अब तक यही मानती है कि सिगरेट और शराब मैगी से कम खतरनाक हैं।
अनिल हासानी, द्वारका, नई दिल्ली

सियासी बवंडर

सियासत, सियासत और सियासत। जहां देखो, उधर ही सियासत की जंग छिड़ी हुई है। या तो वह दिल्ली हो या फिर बिहार। लेकिन कोई नहीं जानता, कल क्या होगा? कल किसी ने नहीं देखा है। छह दशक तक राज करने वाली कांग्रेस कभी केंद्र सरकार को भूमि विधेयक बिल के विरोध में घेरती है, तो कभी वन रैंक, वन पेंशन योजना को लेकर। वहीं, बिहार में सियासी बवंडर ऐसा चल रहा है कि कभी नया दल बनाने वाले जनता परिवार में ही सत्ता पाने को लेकर खटास सामने आ जाती है, तो कभी कांग्रेस का विरोध किया जाता है और फिर उसी के दरवाजे पर पहुंचा जाता है। लालू-नीतीश का लड़ाई के बीच में एक साथ गठबंधन बना लेना, सवाल तो खडे़ करता है।
सचिन शर्मा, मेरठ, उत्तर प्रदेश

बयान पर बवाल

टीवी चैनलों पर यह मुद्दा चर्चा का विषय बना रहा कि हमारे प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के लिए ऐसा क्यों कहा कि 'औरत होने के बावजूद' आपने आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस दिखाई। वैसे, इस कथन पर न तो शेख हसीना को कोई शिकायत है, न वहां के मीडिया को कोई परेशानी है। परेशानी अगर है, तो हमारे देश के 'बेरोजगार' विपक्ष को। कुछ तो चाहिए कहने-सुनने को। क्या हम अक्सर लोगों को यह कहते हुए नहीं सुनते कि अमुक ने लड़की होते हुए भी तीन-तीन बदनाशों से अकेले टक्कर ली, या फिर अमुक महिला अकेले लुटेरों से भिड़ गई। ऐसे प्रयोगों की मंशा नारी की अस्मिता को कम आंकने की कदापि नहीं होती, बल्कि उसकी ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर वर्णित करने की होती है। मोदीजी का उक्त बयान नारी की गरिमा को बढ़ाने वाला है, उसकी अवमानना करने वाला नहीं।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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