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सेहत से खिलवाड़

मैगी में जब से सीसा मिला है, तब से सरकार सक्रिय हो गई है। आनन-फानन में मैगी पर बैन लगा दिया गया। यह इसलिए हुआ, क्योंकि नेस्ले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है। लेकिन क्या सरकार इससे कुछ सीख लेगी? क्या सरकार को यह इंतजार करना चाहिए कि कोई व्यक्ति या प्राइवेट संस्था किसी खाद्य पदार्थ की जांच करे और फिर वह जागे? सरकार को इस तरह का सिस्टम बनाना चाहिए, जिससे ऐसे सभी खाद्य पदार्थों की नियमित जांच हो, जिससे कोई भी कंपनी बाजार में गलत खाद्य पदार्थ न बेचे और जनता की सेहत से खिलवाड़ न हो। यह तो हुआ बहुराष्ट्रीय कंपनी का मामला, लेकिन क्या सरकार खुले में बिक रहे खाद्य पदार्थों की भी जांच करेगी? हर गली-नुक्कड़ में ऐसी खाद्य सामग्रियां बिक रही हैं, जिनसे लोग बीमार होते हैं और मर भी रहे हैं। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि खुले में खाद्य पदार्थ बेचने वाले  लोगों की सेहत से खिलवाड़ न करें।
राजेश कुमार
rajeshkumar5970@rediffmail.com

हर तरफ कट्टरता 

बीते दिनों बद्री नारायण का लेख 'विरासत संवारने और बिगाड़ने वाले' पढ़ा। इसमें जिन रूढि़वादी व अतिवादियों का जिक्र किया गया है, उनकी तरह की सोच रखने वाली शक्तियां हमारे देश में भी हैं। यहां भी लोग मुस्लिम शासनकाल में बनी इमारतों व धार्मिक स्थलों पर एक धर्म विशेष का ठप्पा लगाकर भ्रम फैला रहे हैं। उन शासकों के बारे में गलतबयानी कर रहे हैं। नया इतिहास लिखने, पुरानी सड़कों और शहरों के नाम बदलने की मुहिम छिड़ी हुई है। भारत में मुसलमानों ने अपना शासन स्थापित किया, तो उनका उद्देश्य अंग्रेजों की तरह भारत को अपना उपनिवेश बनाकर लूटना और फिर यहां की दौलत से अपने देश को भरना हर्गिज न था। वे यहां आए, तो भारत को ही अपना देश मान लिया। उन्होंने भारत को खुशहाल व शांति का देश बनाने के लिए हर संभव उपाय किए। अखंड भारत का रूप देकर इसको एक महान देश बनाया।
आसिफ खान, बाबरपुर, दिल्ली

जनता क्यों भुगते

दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मियों द्वारा वेतन न मिलने से सड़कों पर जहां-तहां कूड़ा फैलाकर रोष व्यक्त किया जा रहा है। यह कैसा रोष-प्रदर्शन है? क्या हमारे सामाजिक मूल्यों का इतना ह्रास हो चुका है कि स्वहित के लिए अन्यों को कष्ट पहुंचाया जाए? क्या इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है? क्या सरकार इतनी बेबस है कि इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती या राजनीतिक उद्देश्य-पूर्ति के लिए ऐसा करना नहीं चाहती? जो भी हो, अन्यायपूर्ण और अकारण दंड निरीह जनता क्यों भुगते? जनता भी कब तक आंखें मूंदे रह सकती है? बेहतर होगा कि सभी अपने सामाजिक, प्रशासनिक व राजनीतिक दायित्वों का तत्परता से पालन करें और सभ्य समाज के निर्माण में योगदान दें।
सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

तर्क का तराजू

बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने कहा था या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों के तराजू पर तौलो और अपनी बुद्धिमता से सही-गलत का निर्णय करो। इन ज्ञानी पुरुषों के दिए दिव्य ज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे झुक जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपरि रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते हैं और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी। आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर कटुता व वैमनस्य की भावना पैदा कर देते हैं। यह जानते हुए कि हर विचारधारा ने, चाहे वह दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, स्त्री विमर्श या दलित विमर्श, इंसान के हितों को सर्वोपरि रखा है। हर विचारधारा में कुछ खामियां होती हैं, जो तब की स्थिति-परिस्थिति पर निर्भर करती है। पर हम उसको तथ्यों व तर्कों की कसौटी पर कसने की बजाय अंधानुकरण करें, तो यह समाज हित में नहीं।
दीपक ओझा
ojhadeepak715@gmail.com

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