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ढाक के तीन पात

आज से लगभग पांच-सात साल पहले अगर किसी अखबार में घोटाले या धोखाधड़ी की खबर छपती थी,  तो संबंधित सरकारी विभाग में हड़कंप मच जाता था। अफसरों को तलब किया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अखबार नगर निगम, बिजली महकमा, जल और परिवहन विभाग में जमकर चल रही लूट-खसोट की खबरें छापते हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहता है। क्योंकि न तो जिलाधिकारी या कमिश्नर की कोई प्रतिक्रिया छपती है और न ही भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होती है। क्षेत्र की दुर्दशा जानकर लोगों को गुस्सा तो आता है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों पर कोई असर नहीं पड़ता। आयकर व कस्टम विभाग में घुसते ही अच्छे-अच्छे नेताओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है, लेकिन अन्य विभागों में छुटभैये नेता से लेकर मंत्रियों तक का हस्तक्षेप रहता है। 
परेशान सिंह, पांडव नगर, मेरठ 

ठेकेदारों की मनमानी

यह सर्वविदित है कि ठेकेदारों के एक बड़े वर्ग द्वारा अपनी खुली मनमानी से बेचारी जनता को परेशान किया जाता रहा है। इनके आकाओं के पास इनको देखने और नियंत्रण के लिए तो वक्त ही नहीं होता। सही बात है कि 'जब सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का?' ये लोग दो दिन के काम को भी सौ दिन में करते हैं, ताकि इसको बहुत बड़ा दिखाया जा सके। ये ठेकेदार खुदाई व तोड़फोड़ के मलबे और निर्माण सामग्री, जैसे- रेत, रोड़ी, और ईंट-पत्थर को यूं ही आम रास्तों पर लंबे समय तक डाले रखते हैं, जिससे बेचारी जनता को जाम और हादसों का शिकार होना पड़ता है। शुरू में, दिल्ली मेट्रो ने अपने अच्छे काम से इस दिशा में एक अनुकरणीय मिसाल कायम की। लेकिन किसी ने इसका अनुकरण नहीं किया। निजी ठेकेदारी प्रथा तो विकास की जगह विनाश ही कर रही है। इसलिए इसे समाप्त कर सार्वजनिक प्रणाली को ही पूरी पारदर्शिता से अपनाने की जरूरत है। 
वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली        

आसमान छूती महंगाई

खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर दाल-अनाज-आटा सभी की कीमत आसमान छू रही है। लेकिन मोदी सरकार कहती है कि थोक मंडी में जींस सस्ती हुई है, तो मोदी सरकार यह क्यों नहीं बता पा रही कि अगर जींस थोक मंडी में सस्ती हैं, तो खुदरा बाजार में इतनी महंगी क्यों हैं? जैसे, दवाइयों में थोक मूल्य पर तेईस प्रतिशत मुनाफा कमाकर रिटेल में एमआरपी पर बेची जा सकती है, तो यही नियम आटा-दाल-अनाज आदि पर लागू क्यों नहीं हो सकता? सर्राफा बाजार में भी रोजाना सोने की दर निकलती है और हर अखबार इसको छापता भी है, तो क्या ऐसी ही दर खाने-पीने की वस्तुओं की नहीं निकल सकती? अगर कीमतें रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, तो मोदी क्यों नहीं देश के सामने आकर यह बोलते कि महंगाई के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं? अगर इसी तरह महंगाई बढ़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब सर्राफे में सोना नहीं, बल्कि दालें बिका करेंगी।
शाजिया खान, खैर नगर,  मेरठ  

ताकि नदियां साफ रहें

क्या सच में सरकार और जनता चाहती है कि हिमालय व उसकी नदियां साफ-स्वच्छ रहें? अगर हां, तो फिर सबसे पहले हमारे धर्माचार्यों को एक स्वर में पूजा सामग्री और मानव अस्थियों को नदियों में विसर्जित करने पर पाबंदी लगानी होगी। इसके अलावा, स्कूली किताबों में ही प्रदूषण से जुड़ी बातों को बताना होगा, ताकि बच्चे यह जान सकें कि क्या गलत है और क्या सही। और इस तरह बड़े होकर वे सही के रास्ते पर चलें। साथ ही, हिमालय और अन्य तीर्थ-स्थलों की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को यह बताया जाए कि वे तीर्थाटन से लौटते वक्त अपने कूड़े-कचरे भी साथ लेकर आएं। ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ सख्त जुर्माने या सजा का प्रावधान हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मेरा अनुरोध है कि सबसे पहले हरिद्वार और गढ़ मुक्तेश्वर पर इन सारे सुझावों को अमल में लाया जाए।
जयश्री रोहतगी, लक्ष्मी नगर, नई दिल्ली-92

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