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सरकार बदली, सिस्टम वही

शिवसेना के सामना में छपा कि सौ राहुल भी एक मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते। अब यह व्यंग्य है या यथार्थ, लेकिन दोनों नेताओं में एक समानता यह है कि राहुल गांधी के एक बयान को समझाने के लिए बुजुर्ग कांग्रेसियों को भी मीडिया के सामने आना पड़ता है, वहीं मोदी सरकार की नीतियां-उपलब्धियां समझाने के लिए मोदी समर्थकों को सोशल मीडिया पर आना पड़ता है। देश में सरकार तो बदली, लेकिन सिस्टम नहीं बदला। मोदी सरकार का यह कहना कि भ्रष्टाचार खत्म हो चुका है। कौन-सा नेता कहता है कि उसके शासन में घूसखोरी मिलावटखोरी, चोरी-डकैती होती रही? सच्चाई जनता को पता है।
रामानंदी अग्रवाल, बिजनौर

पेयजल की समस्या
हिन्दुस्तान में जल-प्रदूषण एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। यह समस्या दिल्ली के अलावा अन्य शहरों में भी है। नोएडा, गाजियाबाद व साहिबाबाद जैसे औद्योगिक क्षेत्र के कारण नदियों  का पानी दूषित होता जा रहा है, जिस कारण पानी पीने योग्य नहीं रह गया है। अमीर लोग आरओ वाटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करते हैं, किंतु निम्न परिवार के लोग वही दूषित पानी पीते हैं। ऐसे में, हमारे प्रधानमंत्री जी एक तरफ नदी बचाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ, उद्योग की बात करते हैं। लेकिन निम्न परिवार जो दूषित पानी पीता है, उसके बारे में कोई सरकार न तो बात करती है और न मुद्दा उठाती है। मेरे अनुमान से उद्योग लगने से पानी और ज्यादा दूषित होगा। परंतु अभी समस्या इतनी बढ़ गई है कि हिन्दुस्तान में दूध के दाम पर पानी की बोतलों ने ले लिए हैं। पानी के बोतल 20 से 30 रुपये में मिलते हैं, जिसमें यह गारंटी नहीं होती कि पानी पीने लायक है या नहीं।
अरविंद प्रताप सिंह, गाजियाबाद

अच्छे दिनों के आशय 
अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा करने के  तुरंत बाद वित्त मंत्री ने देश को महंगाई का ऐसा उपहार दिया कि मध्यवर्ग की चीखें निकल गईं। बजट भाषण में भी वित्त मंत्री ने स्पष्ट कहा था कि मध्यवर्ग अपना भला खुद सोचे। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रत्येक निगम और प्रत्येक प्राधिकरण ने भी अपने टैक्स को बढ़ाना शुरू कर दिया है। सर्विस टैक्स क्या बढ़ा, मध्यवर्ग की जिंदगी को ही ग्रहण लग गया, क्योंकि जैसे-तैसे छोटा-मोटा कारोबार करके यह वर्ग जिंदगी खींच रहा था। लेकिन वित्त मंत्री से वह भी देखा न गया। एक राशन कार्ड पर एक रुपये किलो चावल और दो रुपये किलो दाल अनाज पाने के लोभ में कथित गरीब वर्ग ने जनसंख्या को उद्योग के रूप में बढ़ाया। कुछ ने तो सड़कों पर अस्थायी दुकानें, ठेले लगाकर उसका अधिग्रहण कर लिया, सरकार को इनसे खोटी चवन्नी भी नहीं मिलती। मध्यवर्ग दुनिया भर के टैक्स अदा करने के बावजूद हर सरकार द्वारा ठगा जाता रहा है। मोदी कहते हैं कि अच्छे दिन आ गए हैं, तो वह यह भी बता दें कि अच्छे दिनों की परिभाषा क्या है?
रचना रस्तोगी, मेरठ

अल्पसंख्यक का कार्ड
पुरानी बात है। मैं कॉलेज का वाइस-प्रिंसिपल बना ही था। प्राचार्यजी सामान्य प्रशासन और फाइनेंस देखते थे। मैं टाइम-टेबल व शिक्षण व्यवस्था देखता था। सब बढि़या चल रहा था। बस भूगोल वाले प्राध्यापक से छात्र संतुष्ट नहीं थे। वह कक्षा में देर से आते या आने के 20 मिनट बाद तक हाजिरी लेते रहते। फिर पढ़ाने के नाम पर गप्पे हांकते थे। छात्र आए दिन उनकी शिकायत लेकर आते। उन  साहब को खूब समझाया कि वे छात्रों के हित की सोचें। समय पर कक्षा में जाएं। पर वह कहां समझने वाले थे? बात बिगड़ती चली गई। जांच समिति बिठाई गई। जब उनको लगा कि उनका मामला कमजोर पड़ रहा है, तो उन्होंने अल्पसंख्यक कार्ड खेल दिया। भला हो जयपुर में बैठे निदेशक का। वह उनकी कारस्तानी से परिचित थे। फटाक से उनका दूरदराज में तबादला कर दिया गया, अन्यथा कानूनी तंत्र में फंसकर आफत हम पर आने वाली थी! तात्पर्य यह है कि कानून से मिली रियायत का अनुचित लाभ उठाने वालों के बारे में भी कोई कानून बनना चाहिए।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

 

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