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नौकरशाहों पर मतभेद

दिल्ली सरकार का पिछले कुछ समय से नौकरशाहों से विवाद छिड़ा हुआ है। यह विवाद दिल्ली से शुरू होकर केंद्र तक जा पहुंचा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि राजनेताओं द्वारा नौकरशाहों को बांटा जा रहा है। नौकरशाहों की लड़ाई आज से नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही है, जो राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के साथ उनके विवाद होते रहे हैं। केंद्र तक उनकी फरियाद आती रही है। लेकिन दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-राज्यपाल नजीब जंग, दोनों अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए राष्ट्रपति तक से मिल चुके हैं। नौकरशाहों पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी काफी पुराना है। पर बिना किसी तथ्य के भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर आरोप लगते हैं, तो उनका मनोबल गिरता ही है और साथ में आम जनता के बीच उनकी छवि धूमिल होती है। राजनेता हमेशा अपनी राजनीति को चमकाने के लिए बड़े-बड़े नौकरशाहों को निशाना बनाते हैं। उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री, दोनों ही सम्मान के पद हैं, उनके बीच में नौकरशाहों को लेकर किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए।
शरद चंद झा, दिल्ली विश्वविद्यालय

कौन आगे, कौन पीछे

परमाणु वैज्ञानिकों के एक संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में सबसे अधिक परमाणु हथियार अमेरिका के पास हैं। इसके बाद रूस है। फ्रांस तीसरे स्थान पर है और चीन चौथे और ब्रिटेन पांचवें स्थान पर। चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि अपनी रक्षा जरूरतों से कहीं आगे जाकर पाकिस्तान ने भी 120 परमाणु हथियार बना लिए हैं। और वह इसमें लगातार वृद्धि भी कर रहा है। यह इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए। चिंता इस बात की भी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर आतंकियों की नजर लगी हुई है और आतंकियों को शह देने के अनेक उदाहरण पाकिस्तान पेश करता आया है। पाकिस्तान के दो सैनिक शासकों- जनरल जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ- ने तो उस देश की सेना को आतंकियों के पूर्ण समर्थन में लगा दिया। यहां तक कि कारगिल में पाकिस्तानी सेना आतंकियों के रूप में दाखिल हुई थी। इसलिए भारत को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की तादाद में इस गैर-जरूरी वृद्धि को देखते हुए अपने जरूरी इंतजाम कर लेने चाहिए।
अक्षित तिलक राज गुप्ता, रादौर

मुद्दा आरक्षण का

सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर राजस्थान के गुर्जर एक बार फिर आंदोलन की राह पर हैं। पिछली बार जो हुआ, उसकी भयावह तस्वीर अब भी हमारे जेहन में है। महीनों तक दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग और दिल्ली-जयपुर रेल मार्ग के अतिरिक्त सड़क मार्गों पर भी उनका कब्जा रहा। पटरियां उखाड़ दी गई थीं, बसों में आग लगा दी गई और सैकड़ों ट्रक फूंके गए थे। यात्रियों का बुरा हाल हो गया था। लोग महीनों तक स्टेशन पर पड़े हुए थे। लेकिन आंदोलनकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा था। तब पुलिस के बल-प्रयोग से आंदोलन हिंसक हो उठा था। एक बार फिर वैसा ही माहौल बन रहा है। प्रजातंत्र में हर किसी को आंदोलन का अधिकार है, किंतु सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अनुचित है। राज्य सरकार को चाहिए कि संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों पर केस दर्ज करे, सामूहिक दंड लगाए, ताकि लोकतंत्र को कोई बंधक न बना सके।
जसवंत सिंह, नई दिल्ली

मौत के कारण

बीते कुछ दिन गरमियों के नाम रहे हैं। सुबह से देर शाम तक लू का चलना जारी था। जो लोग काम के सिलसिले में बाहर निकल रहे थे, उनकी हालत बहुत खराब थी। मजदूर वर्ग के काफी लोग लू के थपेड़ों के शिकार हुए और उनमें से कई की जान चली गई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि एक तो उनकी जेबों में इतने पैसे नहीं थे कि गरमी से बचने के उपाय कर सकें और दूसरी बात, जब उन्हें लू लग गई, तब उनका सही तरीके से इलाज और देखभाल नहीं हो पाया।
गंगेश कुमार, पटपड़गंज, दिल्ली

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