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निजी विरोध की राजनीति

हालिया विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद आशंका के मुताबिक बीजेपी और कांग्रेस में जुबानी जंग तेज हो गई है। चुनावी माहौल में बयानों की लड़ाई तीव्र होने का मकसद और संदर्भ तो समझ में आता है। मगर अब एक-दूसरे पर तीखे हमले राष्ट्रीय राजनीति के दो शीर्ष दलों के आपसी रिश्तों की हकीकत बताने को काफी हैं। वैसे राजनीति में विजेता से विनम्र व्यवहार की अपेक्षा कहीं ज्यादा की जाती है। अगर सोनिया ने मोदी की तुलना शहंशाह से कर दी, तो विजेता होने के नाते भारतीय जनता पार्टी को इसे अनसुना कर देना चाहिए था। लेकिन वह ऐसा करती नजर नहीं आ रही। बीजेपी को लग रहा है कि शायद इन मुद्दों का फायदा यूपी के चुनाव में मिले। यह बात और है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ही उस पर भारी पड़ेगी।
अभिषेक तिवारी, नोएडा
abhishektiwarius@gmail.com


रेलवे के सुधार कार्य
यह बहुत खुशी की बात है कि देश का सबसे बड़ा सरकारी विभाग, जिसका जाल पूरे देश में फैला है, अपने कुछ ताजा सुधार कार्यों से आगे बढ़ने जा रहा है। अत्याधुनिक स्काडा तकनीक से बिजली की फिजूलखर्ची रोकने और इसके उत्पादन में प्रदूषण कम करने के अलावा सूर्य की रोशनी से स्टेशनों को रोशन करने और कचरे से बिजली बनाने जैसे प्रयास सचमुच सुखद हैं। भारतीय रेलवे द्वारा रेल पटरियों के साथ पड़ी खाली जमीनों पर हरियाली पैदा करना भी एक प्रशंसनीय कार्य है। इससे निश्चय ही प्रदूषण में कमी आएगी और पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ फल-फूल और सब्जियों की पैदावार भी बढ़ सकती है। लगभग सभी शहरों में रेल पटरियों के साथ काफी गंदा पानी भरा रहता है, जिसका सही उपयोग हो सकता है। मोदी सरकार कुछ अच्छा करने का प्रयास जरूर कर रही है, मगर कितना कुछ होगा, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल आम यात्रियों की दयनीय और खतरनाक हालत को देखते हुए पैसेंजर ट्रेनों और स्टेशनों के बारीक निरीक्षण और सुधार की सख्त जरूरत है। यात्रियों की भीड़ को देखते हुए ट्रेनों के फेरे बढ़ाना और कम से कम 22 डिब्बे लगाना बहुत जरूरी हैं। लेकिन दुर्भाग्य से यह काम आजतक नहीं हो पाया है। आशा है, सरकार इस पर भी जरूर कुछ करेगी।
वेद मामूरपुर, नरेला
vedmamurpur@gmail.com


काम नहीं तो वेतन नहीं
एक खबर के अनुसार, स्विट्जरलैंड के 77 प्रतिशत लोगों ने वोटिंग के जरिये यह जाहिर किया है कि हमें बगैर काम के वेतन नहीं चाहिए, जबकि पिछले डेढ़ बरस से हजारों लोग वहां बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष कर रहे थे। वाकई कितने स्वीट हैं स्विट्जरलैंड के लोग, जिन्होंने यह स्पष्ट किया है कि खाली बैठकर खाएंगे, तो समाज पर इसका बुरा असर पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर, हमारे यहां फोकट में जितना मिले, बटोरते जाओ वाली प्रवृत्ति है। भ्रष्ट आचरण के जरिये बड़ी संख्या में लोग धन जमा करते हैं, फिर चाहे वह मंत्री ही क्यों न हों। उन्हें समाज पर पड़ने वाले इसके बुरे असर की भी कोई परवाह नहीं होती।
शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर (म.प्र.)
mahesh_nenava@yahoo.com


शिक्षा का हाल
बिहार की इंटरमीडिएट परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाने वाले छात्र-छात्रा के साक्षात्कार आजकल सुर्खियों में हैं। बड़े-बड़े सपने अपनी आंखों में संजोए अभिभावक शायद यह भूल गए थे कि पैसे खिलाकर आप अपने बच्चों का भविष्य सुधार नहीं रहे हैं, बल्कि उनका बेड़ा गर्क कर रहे हैं। दरअसल, इस पूरे प्रकरण का दुखद पहलू यह है कि इस घटना के बाद भविष्य के बिहार टॉपर्स पर भी उंगलियां उठेंगी। यही नहीं, आने वाले वर्ष में जो छात्र इंटर की परीक्षा देने वाले हैं, इस घटना के बाद उनके मन में भी संदेह की स्थिति पैदा हो गई है। परीक्षाएं जब कदाचारमुक्त तरीके से हो रही हैं, तो परीक्षार्थियों की योग्यता भी सही तरीके से जांची जाए। यही सबके हित में है।
हृत्विक रवि
hritwikravi.hr@gmail.com

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