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बेमिसाल सरकार

मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे हो चले हैं। अगर इन दो वर्षों पर नजर डालें, तो कई उतार-चढ़ाव मिलेंगे। सरकार पर सांप्रदायिक नीतियों को थोपने से लेकर कर्मकांड बढ़ाने तक के आरोप लगे। गोमांस जैसे मुद्दे के बहाने ध्रुवीकरण की कोशिश भी हुई। बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में लेखकों और कलाकारों ने सम्मान भी लौटाया। मगर इन सबके बावजूद दो साल में देश काफी आगे बढ़ा है। तमाम देशों से हमारे संबंध तो सुधरे ही हैं, विकास की पटरी पर भी गाड़ी दौड़ने लगी है। यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में नीतिगत पक्षाघात की बात कही जाने लगी थी, यानी नीतियां बनाने के मोर्चे पर सरकार नाकाम थी, मगर अब ऐसी स्थिति नहीं। अब नीतियां बन भी रही हैं, और वे जमीन पर दिखने भी लगी हैं।
रमणकांत, गणेश नगर, दिल्ली

उफ ये बाबा
आजकल देश में बाबाओं की बाढ़-सी आई हुई है। वैसे तो इनका काम लोगों को अध्यात्म का रास्ता दिखाते हुए उनका परमेश्वर से मेल कराना है, मगर हाल की कुछ घटनाएं बताती हैं कि धर्म और अध्यात्म की आड़ में कुछ बाबाओं द्वारा मजबूर महिलाओं का शोषण किया जा रहा है। आज जब हमारे सामने कई बाबाओं की पोल खुल चुकी है, तब हमारे समाज और परिवारों के लिए जरूरी हो गया है कि हम अपने आसपास पनप रहे ऐसे ढोंगी बाबाओं से सचेत रहें।
सीमा चौहान

इतने कर्मकांडी क्यों
भारत लगातार उन्नति कर रहा है। हमारे बच्चे देश-दुनिया में नाम कमा रहे हैं। फिर भी, हम परपीड़क कर्मकांडों से नाता नहीं तोड़ सके हैं। कुछ हुआ नहीं कि दिमाग में बेकार की बातें घूमने लगती हैं। हम अंधविश्वासी हो जाते हैं। बाबाओं की दुकानों के बढ़ने के पीछे यही वजह है। अभी एक बाबा महिलाओं के शोषण के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं। ऐसे बाबाओं की फेहरिस्त छोटी नहीं। आखिर जब हम जानते हैं कि बाबा हमसे ऐंठने में जुटा है, तब फिर कैसे हम उसकी जाल में फंस जाते हैं? महिलाओं की स्थिति तो और खराब हो जाती है, क्योंकि दाग उनकी इज्जत पर लगता है। असल में जरूरत यही है कि समाज को ऐसे बाबाओं के प्रति जागरूक बनाया जाए, और यह तभी होगा, जब शिक्षा की लौ घर-घर तक पहुंचेगी। जब हमें पता चलेगा कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत, तभी हम अंतर कर पाएंगे। बाबाओं की दुनिया का तिलिस्म इसी से टूटेगा।
समिधा झा, महरौली, नई दिल्ली

निजी स्कूलों का शोषण
आजकल कई स्कूल (खासकर उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में) शिक्षक पद के प्रशिक्षित बेरोजगार उम्मीदवार अभ्यर्थियों से पैसे उगाहने में जुटे हैं। चाहे स्कूलों में एक भी रिक्ति क्यों न हो, ये हर तीन-चार माह में ऐसी छद्म रिक्तियां निकालते हैं, जिनके लिए आवेदन शुल्क 100-200 या इससे भी अधिक होता है। मुश्किल यह है कि आवेदन करने के महीनों बाद या तो ये आपको बुलाएंगे नहीं या फिर कोई न कोई बहाने बनाकर टाल देंगे। ऐसे में, इन रिक्तियों को क्यों न लूटने का माध्यम मानें, जिनसे हजारों रुपये की आमदनी स्कूलों की होती है?
आभा कुमारी
abhajay@gmail.com

फायदे का आईपीएल
क्रिकेट जगत के इतिहास में आईपीएल ने अपनी एक पहचान बना ली है, जहां क्रिकेट प्रेमियों से इसका खुमार उतरने का नाम नहीं ले रहा है, वहीं इसमें लगातार नए प्रतिभावान खिलाडि़यों को अपना दम-खम दिखाने का मौका भी मिल रहा है। आलोचकों को तो बस आलोचना का मौका चाहिए, भले ही उस प्लेटफॉर्म से किसी को नई जिंदगी ही क्यों न मिल रही हो? आज कई लड़कों को निखरने व उभरने का पूरा मौका आईपीएल दे रहा है। ऐसे में, आलोचकों को आलोचना करना छोड़ इन युवाओं का साथ देना चाहए। इससे जोश व जुनून के साथ नए खिलाड़ी जुडे़गे।
सलील श्रीवास्तव, 12/22 नोएडा
Salilsri77@gmail.com

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  • Web Title:modi government completed two year