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निशाने पर पत्रकार

आज जिस तरह पत्रकारों की हत्या की जा रही है, वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने की साजिश है। अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के अनुसार, भारत में 1992 से लेकर अभी तक 60 से अधिक पत्रकारों की हत्या हो चुकी है, मगर चंद मामलों में ही मामला अंजाम तक पहुंचा। इसके साथ ही यह भी पता चला है कि जो पत्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ संजीदगी से जंग लड़ता है, उसकी हत्या की आशंका ज्यादा होती है। लोकतंत्र के इन प्रहरियों की सुरक्षा क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं और उन पर नियंत्रण रखने वाले लोगों को नहीं करनी चाहिए?
कपिल मिश्रा, किराड़ी, नई दिल्ली
munikapil2811@gmail.com

खत्म होती जिंदगी
12वीं के परिणाम आने पर सूबे के मुख्यमंत्री की अपील के बावजूद प्रदेश में छात्रों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं। दोषी कौन है, इसका तो पता नहीं, मगर ऐसी घटनाएं न सिर्फ घर-परिवारों के लिए, बल्कि सरकार के लिए भी चिंतनीय हैं। इस प्रतिस्पर्द्धी युग में हमारे बच्चों पर आखिर किस तरह का मानसिक दबाव पड़ रहा है कि वे जिंदगी से हाथ धोने को मजबूर हो रहे हैं? हम यह मान सकते हैं कि इस आधुनिक समाज में दूसरे से आगे निकलने के लिए प्रतिस्पर्द्धी मानसिकता जरूरी है, मगर बच्चों पर इतना ज्यादा दबाव भी नहीं होना चाहिए कि वे गलत कदम उठाने को मजबूर हो जाएं। आत्महत्या के खिलाफ माहौल बनाने में अभिभावकों, शिक्षकों, शिक्षण संस्थाओं व कोचिंग इंस्टीट्यूटों, सभी को अहम भूमिका निभानी होगी। साथ ही, शिक्षा पद्धति में भी आमूल-चूल पतिवर्तन होना चाहिए और महंगी शिक्षा पर रोक लगनी चाहिए। अनमोल जीवन यूं बर्बाद न हों, इसके लिए ठोस उपाय करने होंगे।
शकुंतला महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर, मध्य प्रदेश

फिर से रावत
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए पिछले दो महीने काफी उथल-पुथल भरे रहे। अपने ही विधायकों ने ऐसी बगावत कर दी कि उन्हें कुछ समय के लिए अपने पद से हाथ धोना पड़ा। राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगा और जमकर सियासत हुई, जिसमें उनके स्टिंग वीडियो भी सामने आए। उन पर कई तरह के आरोप जड़े गए। अब एक बार फिर वह मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ गए हैं। मगर उनके लिए अब नेतृत्व संभालना इतना आसान नहीं होगा। अच्छी बात यह है कि इस विवाद के बहाने उनकी कुरसी मजबूत हो गई। राज्य में भी आलोचना के सभी सुर बंद हो गए और जनता की सहानुभूति फिर से उनके पास आ गई है। मगर राजनीति इतनी सरल नहीं होती। अगले साल चुनाव तक उन्हें अपनी क्षमता फिर से दिखानी होगी, नहीं तो दुनिया जानती है कि कमजोर सियासतदां का क्या हश्र होता है?
परवेश, देहरादून, उत्तराखंड

बढ़ती गरमी का नतीजा
बढ़ रहा तापमान चिंतनीय है। ऐसा आकलन है कि अगले 50 या 100 वर्षों में धरती का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि जीवन के लिए कई सारी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। हमें वायुमंडल में बढ़ रही कार्बन डाई-आॠक्साइड की मात्रा को थामना ही होगा। इस विनाशक गैस के बढ़ने की मुख्य वजह जीवाश्म ईंधनों जैसे कि कोयला व पेट्रो उत्पादों का अत्यधिक इस्तेमाल और जंगलों की कटाई है। इन पर नियंत्रण जरूरी है। हमें यह समझना होगा कि बढ़ता तापमान बाढ़ भी बुलाएगा। जल्दी ही हमने कुछ न किया, तो हमारी मुसीबत और बढ़ेगी।
मुकेश विश्वकर्मा, विकास नगर, नई दिल्ली

लड़कियों का जज्बा
उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में यूं तो पहले भी छात्राओं का प्रदर्शन अच्छा रहा है, पर इस बार हाई स्कूल व इंटरमीडिएट के टाॠप फाइव में छात्राओं का ही परचम लहराया है। यह बताता है कि लड़कियां पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर हो रही हैं। ऐसे माता-पिता को अपनी सोच बदलनी चाहिए, जो लड़कियों को बोझ समझते हैं, और उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं दिलाते। 
प्रमोद चौहान, हल्दौर, बिजनौर
 

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