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भूल की याद

'अतीत की भूल का सुधार' शीर्षक से प्रकाशित राकेश सिन्हा के विचार पाकिस्तानी और बांग्लादेशी हिंदुओं के संदर्भ में बिल्कुल सटीक हैं। क्या नेहरू जी और दूसरे कई बड़े नेता सिर्फ इसलिए हिंदुओं की समस्याओं से आंखें मूंदे रहे क्योंकि वे बहुसंख्यक थे या उन्हें अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को धक्का पहुंचने का डर था? आज भी भारत में कुछ लोग अगर उलटे-सीधे बयान देते हैं, तो सबकी भवें तन जाती हैं, मगर बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण, उन पर हो रहे जुल्म पर कोई बहस नहीं होती। उनके मानवाधिकार की चिंता किसी को नहीं। यह कहने की जरूरत नहीं कि वहां जितने भी जुल्म होते हैं, वे सरकार की शह पर ही होते हैं, अन्यथा अब तक वे रुक चुके होते।
उर्मिला सिंह, लोहरदगा
singhurmila25.us@gmail.com

कोहेनूर पर दावा
हमलोग अब तक यही सुनते आए हैं कि कोहेनूर हीरा को अंग्रेज हुकूमत हमारे यहां से ले गई थी। उस पर हमारा हक है। मगर अब सरकार का मानना है कि वह यहां से चुराई नहीं गई, बल्कि उसे उपहार में दिया गया है, इसलिए उस पर हमारा कोई दावा नहीं। लाहौर में अंग्रेजों और सिखों के बीच हुई संधि के मुताबिक वह ब्रिटेन की महारानी को भेंट किया गया था। क्या वाकई यही सच्चाई है, या फिर कहानी कुछ और है? अगर सच में इसी वजह से केंद्र सरकारें अब तक कोहेनूर हीरा को वापस लाने को लेकर नरम रुख अपनाती रही हैं, तो फिर यह सच्चाई आज तक गोपनीय क्यों रखी गई थी? आखिर क्यों नहीं पहले ही इस नजरिये को सार्वजनिक किया गया, जबकि कोहेनूर हीरा को वापस लाने को लेकर वक्त-बेवक्त मांग उठती ही रही है। मुझे लगता है कि कूटनीतिक रिश्तों की वजह से भारत सरकार ऐसा कह रही है। भले ही कूटनीतिक संबंध की अपनी सीमा है, पर सच्चाई को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं बनानी चाहिए। अदालत ने भी तो यही कहा है कि इस पूरे मामले पर विस्तार से जानकारी दी जाए। भारत सरकार को चाहिए कि तथ्यात्मक रूप से वह तमाम तर्क रखे और सच्चाई बताए। कूटनीतिक रिश्तों की बेदी पर हकीकत की बलि नहीं चढ़नी चाहिए।
रमणकांत, भजनपुरा, दिल्ली

फायदे एक साथ चुनाव के
वाकई चुनाव सुधारों में सबसे बड़ा सुधार है, संसद और सभी राज्य  विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराना। इससे देश के बहुमूल्य समय, धन और शक्ति की बचत होगी। केंद्र सरकार को जल्द से जल्द सभी दलों को विश्वास में लेकर इससे संबंधित बिल लाना चाहिए। जो पार्टी इसका विरोध करेगी, वह जनता की नजर में बेपरदा होगी, और यदि सरकार स्वयं पहल नहीं करती, तो खुद उसकी मंशा भी सामने आएगी।
वेद मामूरपुर ,नरेला
vedmamurpur@gmail.com

संघ-मुक्त भारत का सपना
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश को संघ-मुक्त बनाने के अभियान पर हैं! प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जब अपनी प्रसिद्धि के चरम पर थे और उन्हें गांधी-हत्या का भावनात्मक सहारा भी मिल गया था, तब उसकी आड़ लेकर उन्होंने संघ पर पाबंदी लगाई थी। सोच यही थी कि आरएसएस का खात्मा करना है। मगर डेढ़ साल में ही बिना शर्त प्रतिबंध हटाना पड़ा। उसके बाद संघ खूब फला-फूला। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान संघ को न सिर्फ प्रतिबंधित रखा, बल्कि उसके स्वयंसेवकों को भीषण यातनाएं दीं। मगर उनका तख्ता पलट गया तथा संघ पाबंदी-मुक्त हो गया। नीतीश की हैसियत नेहरू-इंदिरा गांधी से तो कम ही है। जब वे बड़े नेता भारत को संघ-मुक्त न कर सकें, तो भला नीतीश कुमार क्या कर पाएंगे? अंग्रेजों के समय में भी जब संघ अपने शैशव अवस्था में था, तो सरकारी, अर्द्ध-सरकारी व स्थानीय निकाय के कर्मचारियों के उसमें भाग लेने पर प्रतिबंध लगा था, जो दो साल में निष्प्रभावी साबित हो गया। बेहतर होता कि नीतीश जी देश को भ्रष्टाचार, जातिवाद, गरीबी, असमानता से मुक्त करने की बात करते।
अजय मित्तल, खंदक, मेरठ

 

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