DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बिगड़ती आबोहवा

पर्यावरण के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है, मगर औद्योगिक विकास की आपाधापी में शायद वह यह भूल गया है। आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य ने प्रकृति के साथ व्यापक मात्रा में छेड़छाड़ की, जिससे पृथ्वी के अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। जलवायु परिवर्तन को लेकर आज विश्व मंच पर तमाम बातें हो रही हैं, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि 1992 का रियो पृथ्वी सम्मेलन हो या 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल, इनमें जो भी वादे किए गए, उनमें से अधिकतर को पूरा करने जोर नहीं दिया गया। अभी पेरिस में भी विश्व के दिग्गज नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को लेकर मंच साझा किया। एक नई उम्मीद और आशा के साथ कार्बन उत्सर्जन में कटौती की बात कही गई। आशा करते हैं कि इस बार कथनी और करनी में फर्क नहीं रहेगा।
विवेक मिश्रा, भदोही, उत्तर प्रदेश

असहिष्णु होता विपक्ष
देश में पिछले कुछ समय से असहिष्णुता का माहौल बना हुआ है। इसी कारण कई साहित्यकारों और कलाकारों ने अपने सम्मान भी वापस लौटाए, जिनका विपक्ष ने राजनीतिक हथियार बनाकर केंद्र सरकार पर जमकर प्रहार किया। यहा तक कि संसद में भी असहिष्णुता को लेकर खूब माहौल गरमाया। जनता को भी विरोध में लाने की पूरी कोशिश की गई। असहिष्णुता का तात्पर्य सहनशीलता की कमी से है। सरकार पर आरोप लगाने वाला विपक्ष अब खुद ही असहिष्णुता का शिकार हो चला है। नेशनल हेराल्ड केस को लेकर कांग्रेसी खेमे में असहिष्णुता का माहौल दिख रहा है। दोनों सदनों में जमकर हंगामा मचाने से उसका असहिष्णु रूप जनता के सामने आ गया है। अगर गांधी परिवार को अपने ऊपर भरोसा है कि वह गुनहगार नहीं है, तो कांग्रेस पार्टी क्यों इतना हंगामा मचा रही है? क्यों उसके नेता देश में असहिष्णुता बढ़ा रहे हैं? अगर नेता ही ऐसी हरकतें करेेंगे, तो वे जनता को क्या सिखाएंगे?
लोकेश खेड़ा, महरौली

नए प्रयास की जरूरत
दिल्ली सरकार का सम और विषम नंबरों की गाडि़यों को अलग-अलग दिन चलाने का फैसला प्रशंसनीय है। इस कदम से निश्चित तौर पर प्रदूषण कम होगा और जाम की समस्या से दिल्ली को निजात मिलेगी। आम लोग भी सार्वजनिक परिवहन और कार पूलिंग का इस्तेमाल करना सीखेंगे। इसके साथ ही सरकार को निजी गाडि़यों (कारों/स्कूटरों) के खरीदने के लिए बैंक लोन और जीरो डाउन पेंमेंट पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए, जिससे गैर-जरूरतमंद लोग गाडि़यों को खरीदने के लिए हतोत्साहित हों। इस तरह के उपायों से ही दिल्ली आने वाली पीढि़यों के लिए रहने लायक बच सकेगी।
मनोज कुमार सहनी, रोहिणी, दिल्ली

क्रिकेट पर बेताबी क्यों
एक तरफ सीमा पर सैनिकों की कुर्बानी हो रही है, दूसरी ओर क्रिकेट से जुड़े राजनीतिक लोग भारत और पाकिस्तान के बीच मैच कराने के लिए बेतुके तर्क दे रहे हैं। ऐसे लोग देशहित की कम, अपने आर्थिक हित की ज्यादा चिंता कर रहे हैं। शर्मनाक है यह। जिन्हें खेल का ककहरा भी नहीं पता, वे खेल संगठनों के पदाधिकारी बन बैठे हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि खेल संगठनों के पदाधिकारी खिलाड़ी ही हों।
यश वीर आर्य

खुद करें फैसला
आईएएस की तैयारी कर रही एक छात्रा की आत्महत्या की खबर सुनकर दुख हुआ। अभी बीते अगस्त में मेरे एक करीबी दोस्त ने भी इसी तरह अपने जीवन का अंत कर लिया था। एक बात साफ है कि कई अभ्यर्थी अपने परिवार व समाज के दबाव के चलते इसकी तैयारी करते हैं, और जब दबाव के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते, तो अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। बेहतर होगा कि विद्यार्थी किसी भी दबाव से मुक्त हो अपने भविष्य का फैसला खुद करें।
अब्दुल्लाह कुरैशी, राजस्थान

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:environment pollution