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भूख के मारे बच्चे

दिल्ली की सड़कों पर करीब 60 हजार बच्चे काफी असहाय स्थिति में जिंदगी बसर करते हैं। इनमें से ज्यादातर को भूखे सोना पड़ता है और रात में नींद आ सके, इसके लिए ये नशे का सहारा लेते हैं। अगर ये बच्चे नशे से बचना भी चाहें, तो बड़े व बालिग नशेड़ी इन्हें बख्श नहीं पाते। इन बच्चों को जबर्दस्ती नशे का आदी बनाया जाता है। जब एक बार ये नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं, तो फिर इन्हें चोरी-चकारी, लूट और जेबतराशी के धंधे में धकेल दिया जाता है। सरकारी रैन-बसेरे भी इन छोटे बच्चों को सुरक्षित नहीं रख पाते, क्योंकि सरकारी उदासीनता की वजह से ये रैन-बसरे अपराधियों के अड्डे बनकर रह गए हैं। दिल्ली सरकार को सभी रैन-बसेरों को अपराधियों से मुक्त कराना चाहिए और नशे के आदी बना दिए गए इन बच्चों का इलाज कराने की मुकम्मल व्यवस्था करनी चाहिए।
मोतीलाल जैन 99, सूर्या निकेतन, दिल्ली- 92 

विदेशी मीडिया की हिमाकत
यह बात हमारी समझ से परे है कि भारत में प्रसारण करने वाले विदेशी न्यूज चैनल भारत और भारतवासियों की भावनाओं से खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं? पूरा विश्व इस हकीकत से परिचित है कि पाकिस्तान ने भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य के एक तिहाई हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है। पाकिस्तान के इस अवैध कब्जे को भारत ने कभी मान्यता नहीं दी और आज भी संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इस लिहाज से दुनिया के किसी भी देश, संगठन और संस्था को यह हक नहीं पहुंचता कि वे पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान या चीन का हिस्सा दिखाएं। मगर भारत के प्रति दुराग्रह रखने वाली शक्तियां अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहीं। उदाहरण के लिए, पहले अल-जजीरा न्यूज चैनल मौसम संबंधी अपनी रिपोर्टों में पाक द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए इलाकों को पाकिस्तान का हिस्सा दिखा रहा था। इसके खिलाफ आवाज उठाने पर शायद अल-जजीरा ने भारत पर मौसम संबंधी खबर दिखानी बंद कर दी है। मगर अब बीबीसी वर्ल्ड न्यूज कश्मीर के उस हिस्से को पाकिस्तान का अंग दिखाकर भारतीयों की भावनाओं को आहत कर रहा है। सरकार बीबीसी द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर को भारत से विलगाकर खबर प्रसारित करने पर तुरंत रोक लगाए।
अक्षित तिलक राज गुप्ता, रादौर, हरियाणा

शराबबंदी के बाद
बिहार सरकार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी है। इसे लेकर जहां एक तरफ खुशियां जताई जा रही हैं, तो दूसरी ओर दिलचस्प खबरें भी पढ़ने को मिल रही हैं। ऐसी ही एक खबर बताती है कि एक व्यक्ति को शराब न मिली, तो वह आधा किलो साबुन खा गया। अगर इस तरह के हास्यास्पद समाचारों को एक तरफ रख भी दें, तो इस बात का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए कि अगले एक महीने में, एक साल में इस नीति का बिहार के समाज पर क्या प्रभाव पड़ा? इसे सिर्फ पुलिस थानों के मुकदमों के आंकड़ों के जरिए नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में आई तब्दीलियों के आधार पर समझना चाहिए। और यह अध्ययन सिर्फ केंद्र या बिहार सरकार न करे, बल्कि विभिन्न समाजसेवी संगठन भी करें, ताकि सही-सही जानकारी हमारे पास हो और हम उनके आलोक में भविष्य के निर्णय कर सकें। परिणामों पर चर्चा तो इसके बाद ही होगी, फिलहाल नीतीश बाबू का शुक्रिया।
आद्या सिंह, बोरिंग रोड, पटना

महापुरुषों पर रहम करें
नश्तर कॉलम के तहत ‘नल-नील के दफ्तर में मार्च क्लोजिंग’ शीर्षक से शैलेश त्रिपाठी का व्यंग्य लेख छपा है। इसमें ऋषि दुर्वासा, नल-नील और हनुमान जी को व्यंग्य का माध्यम बनाया गया है। अच्छा नहीं लगा। धार्मिक महापुरुष हमारे धर्म और संस्कृति के आधार हैं। उन पर अमर्यादित टिप्पणियां किसी भी दशा में उचित नहीं हैं। ऐसे लेखन का बहिष्कार किया जाना चाहिए।
कृष्ण कुमार नाज, सी-130, हिमगिरि कॉलोनी, मुरादाबाद
kknaaz1@gmail.com
 

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