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उपेक्षित है कुर्किहार बौद्ध स्थल, बढ़ में छिपी है बेशकीमती मूर्तियां

वजीरगंज। बुद्धकालीन अवशेषों का धरोहर और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल कुर्किहार सरकारी उपेक्षा के कारण यह गांव विकास से कोसों दूर है। यह स्थल गया जिला के वजीरगंज प्रखण्ड अंतर्गत बोधगया से तपोवन पथ में वजीरगंज से चार किलोमीटर पूरव में अवस्थित है। यहां एक प्राचीन गढ़ है। इसमें बुद्धकालीन एवं सनातन संस्कृति की असंख्य प्राचीन मूर्तियां छिपी है। यहां की मूतियां अष्टधातु एवं कीमती काले पत्थरों से निर्मित हैं। हालांकि यह गढ़ पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। इसके बावजूद यह स्थल उपेक्षित है। इस गढ़ से महात्मा बुद्ध के अनेकों कालाकृतियां मिली है। जिसे ग्रामीणों द्वारा स्थानीय देवी मंदिर में सुरक्षित रखा गया है, वह बोधगया से तपोवन होते राजगीर की ओर जाने वाले पर्यटकों के दर्शनार्थ खुला रहता है। इस मंदिर में सनातन संस्कृति से जुड़ी दर्जनों मूर्तियां भी अवस्थित है जो क्षेत्र के लोगों के लिए श्रद्धा का केन्द्र है। यहां के ऐतिहासिक गढ़ की खुदाई विस्तार से नहीं कराई गई है लेकिन उम्रदराज ग्रामीणों के अनुसार आजादी के पूर्व करीब 1930 ई0 में तत्कालीन जमींदार राय हरि प्रसाद हल्की खुदाई करायी गयी तब सैंकड़ों मूर्तियां प्राप्त हुई थी। इस गढ़ से प्राप्त 226 बेसकीमती मूर्तियां पटना संग्रहालय में अभी सुरक्षित है जिनमें 80 मूर्ति अष्टधातू एवं शेष दुर्लभ काले पत्थरों की बनी है। जानकार बताते हैं कि जब नालन्दा विश्वविद्यालय अपने अस्तित्व में था तब मूर्ति एवं शिल्प कला का प्रशिक्षण केन्द्र कुर्किहार हुआ करता था। बुद्ध का विश्राम स्थल - इतिहासकार बताते हैं कि जब गौतम बुद्ध कपिलवस्तु से निकलकर ज्ञान की खोज में भटकते हुए बोधगया जा रहे थे तब एक रात को इसी कुर्किहार में उनका विश्राम हुआ था। पुन: ज्ञान प्राप्ति के बाद बोधगया से भिन्न - भिन्न स्थलों पर उपदेश देते हुए वापस होने के क्रम में भी दोपहर को ठहरकर अपना उपदेश दिये थे। तब यह स्थल कुर्क बिहार के नाम से प्रसिद्ध था। इसी कारण इस क्षेत्र में बुद्ध के उपासक हमेशा आते रहे और कुर्किहार की सीमा पर अवस्थित कुकुटगिरी पहाड़ पर उपदेश एवं बौद्ध धर्म के प्रचार - प्रसार का काम किया करते थे। कहते हैं कुर्क बिहार बोधगया और राजगृह के ठीक बीचो बीच अवस्थित है। इस कारण बौद्ध श्रद्धालु यहां दिन रात विश्राम किया करते थे।विश्वस्तरीय प्रदर्शनी में लगी मूर्तियां वर्ष 2005 में विश्वस्तरीय मूर्तिकला की प्रदर्शनी आस्ट्रेलिया में लगाई लगाई गई थी। तब भारत सरकार ने तीन मूर्तियां प्रदर्शनी में लगाई थी। जिनमें दो मूर्तियां इसी कुर्किहार गढ़ की थी। तब बिहार की सत्ता में रहे लालू प्रसाद के हस्तक्षेप से इन दो मूर्तियों की कीमत तीन अरब डॉलर निर्धारित करते हुए भारत और आस्ट्रेलिया के सरकारों के बीच मुचलका (बॉड पत्र ) बना गया था।पर्यटन के क्षेत्र में असीम संभावनाएं - करीब दो वर्ष पूर्व एनडीए गठबंधन सरकार के पर्यटन मंत्री सुनील कुमार पिंटु के साथ पुरातत्व विभाग के अधीक्षक कुर्किहार आये थे तो यहां के ऐतिहासिक धरोहारों का गहराई से अवलोकन किया था। इसके बाद उन्होंने खुले मंच से स्वीकार किया था कि यह स्थल नालंदा , विक्रमशिला और खजुराहो से मिलता जुलता है। यदि इसकी खुदाई कर पर्यटन से जोड़ा जाय तो क्षेत्र में विकास की असीम संभावनाएं बनती है। विदेशी पर्यटकों के लिए बोधगया के बाद यह दूसरा सबसे लोकप्रिय स्थल बन सकता है।सरकार की घोषनाएं हवा - हवाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2010 में इस गांव का भ्रमण किया था। गांव की एक - एक गलियों मंदिरों एवं मूर्तियों का अवलोकन करने के बाद सभा को सम्बोधित करते हुए इसे पर्यटन से जोड़ने के साथ - साथ कई घोषणाएं की थी। उन्होंने ग्रामीणों की सहमती से गढ़ की खुदाई , जलमीनार का निर्माण , मूर्ति शिल्प कला प्रशिक्षण की स्थापना, यात्री ठहराव के लिए बंगला निर्माण, स्टेट हाईवे से जुड़ाव सहित अन्य घोषणाएं की थी। लेकिल 5 वर्ष बित जाने के बावजूद घोषणाओं पर किसी प्रकार का अमल नहीं किया गया है।

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  • Web Title:Kurkihar neglected Buddhist site, lies in increased prized sculptures