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महात्मा हितहरिवंश

महात्मा हितहरिवंश राधा वल्लभीय सम्प्रदाय के उपासक थे। श्रीकृष्ण और राधा की युगल माधुरी के प्रति उनकी भक्ित बचपन से ही शुरू हुई और निरंतर बढ़ती गई। उनके साथ कई चमत्कारी घटनाएं लोगों ने देखी और अनुभव की। अस्तु उन्हें श्रीकृष्ण की वंशी का अवतार माना गया। उनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में हो गया था। उसके बाद ही माता-पिता का देहान्त हो गया। हितहरिवंश ने तब वृन्दावन जाकर रहने का निश्चय किया। वह अपना ‘बाद’ ग्राम (मथुरा के निकट) छोड़कर वृन्दावन के लिए चले। मार्ग में चिड़थावल नामक ग्राम में आत्मदेव नामक ब्राह्मण ने उन्हें राधावल्लभ की सुंदर मूर्ति भेंट की। वृन्दावन आकर उसी मूर्ति की उन्होंने स्थापना की और गृहस्थ वेश में रहकर भजन करने लगे। राधा-कृष्ण की लीला के अनेक पदों की उन्होंने रचना की। ‘आज गोपाल रासरस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी। शरद विमल नभ चंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी। हित हरिवंश मगन मन स्यामा हरत मदन घन पीर री सजनी’। उन्होंने श्रीराधा की उपासना पर बल दिया। उनका मानना था कि राधा की उपासना और प्रसन्नता से ही कृष्ण भक्ित का आनंद प्राप्त होता है। महात्मा हितहरिवंश की राधा-भाव उपासना पद्धति इतनी सिद्ध थी कि उन्हें तत्कालीन संत इस उपासना का आचार्य मानते थे। राधा जी में उनकी अनन्य आस्था थी। वह कहते थे- ‘रसना कटौ जु अन रटौ, निरखि अन फुटौ नैन। स्र्वन फूटौ ज अन सुनौ, बिन राधा जस बैन। हितहरिवंश जी राधावल्लभीय सम्प्रदाय के सिद्धांतों को मानते थे। वह कहते थे- ‘यदि जीव वास्तविक सुख चाहता है तो उसे अपना शरीर सत्संग में रखना चाहिए। मन प्रेम-रस में सराबोर रखना चाहिए। हितहरिवंश के भगवत भजन की रीति अद्भुत थी। वह श्रीराधा रानी के चरणों को हृदय में धारण कर श्रीकृष्ण की उपासना करते थे। इसलिए हितहरिवंश की उपासना को सखी भाव की उपासना माना गया है। वे कहते थे- ‘मैं अपने जन्म कर्मानुसार नरक में जाऊं या परमपद प्राप्त करूं, सर्वत्र मेर हृदय में श्री राधारतिनिकुांमंडली ही सर्वदा विराजी रहे’।

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  • Web Title: महात्मा हितहरिवंश