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ताड़ी न पीएं, लीवर होगा खराब

आंत की टीबी होने पर अक्सर गैस का इलाज किया जाता है। इससे मरीजों पर बुरा असर पड़ता है। जांच के बाद ही किसी मरीज का इलाज किया जाना चाहिए। इस रोग में पेट के अन्दर पानी भर जाता है। सभी मरीजों में बीमारी का पता लगाने के लिए पीसीआर जैसी महंगी जांच की जरूरत नहीं होती। यह जानकारी इंडियन सोसायटी ऑफ गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी (आईएसजी) की बिहार-झारखंड शाखा की ओर से आयोजित सम्मेलन के अंतिम दिन विशेषज्ञों ने दी।ड्ढr ड्ढr सोसायटी के राष्ट्रीय सचिव डा. एसपी मिश्रा ने बताया कि अल्ट्रासाउंड जांच में आंत के अन्दर कोई सूजन अथवा गांठ का पता चले तो उसकी एफएनएसी जांच करानी चाहिए। इससे टीबी का पता चल जाता है। आंत की टीबी के इलाज में दवा शुरू करने पर कोई परशानी हो तो उसपर तत्काल ध्यान देने की जरूरत होती है। जिन टीबी मरीजों को किडनी व लीवर संबंधी दिक्कत है, उन्हें कुछ दवाएं बन्द कर क्यूनोलोन नामक एंटीबायोटिक देने से लाभ मिलता है। डा.समीर महेन्द्रा ने बताया कि ताड़ी व दूषित पानी पीने से लीवर खराब होता है। हेपेटाइटिस वायरस लीवर को अधिक नुकसान पहुंचाता है। लीवर खराब होने पर मरीज का इलाज आईसीयू में किया जाना चाहिए। इसके साथ अन्य अंग प्रभावित हो तो उसका इलाज भी एक साथ किया जाना चाहिए, वरना मरीज की मौत भी संभव है। पीजीआई, चंडीगढ़ के डा.वीरन्द्र सिंह ने बताया कि हेपेटाइटिस-बी की बीमारी में कुछ महंगी दवाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल करना गलत है। सम्पूर्ण लक्षणों के आभाव में ऐसी दवाएं देने से नुकसान होने की आशंका रहती है।ड्ढr ड्ढr डा.अशोक कुमार और डा.महेश गोयनका ने भी व्याख्यान दिया। डा.बीके अग्रवाल, पद्मश्री डा. विजय प्रकाश, डा. प्रकाश कुमार, डा.विमल कुमार, डा. मनोज कुमार के अलावा झारखंड के डा.सतीश मिधा और डा.रमेशचन्द्रा आदि ने हिस्सा लिया। डा. मनीष तीसरी बार बने सचिव, विमल अध्यक्षआईजीआईएमएस के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. मनीष मंडल को तीसरी बार आईएसजी बिहार-झारखंड का सचिव चुना गया। डा. विमल कुमार को अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि डा.मनोज कुमार उपाध्यक्ष चुने गए हैं।

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