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इतिहास में खो गया बाबर का खूबसूरत अफगानिस्तान

अमेरिकी बमबारी और दो दशकों से निरंतर हो रहे हमलों से आज जर्जर हो चुके अफगानिस्तान के कंधार, काबुल, हेरात और मजार ए शरीफ जैसे शहर एक समय अपनी खूबसूरती, जलवायु तथा बेहतरीन किस्म के मेवों के उत्पादन की वजह से दुनियाभर में मशहूर थे। वर्तमान में आतंकवाद और तालिबान की दहशत से घिरा यह राष्ट्र करीब छह सौ साल पहले जन्नत की तरह हसीन होने के साथ-साथ सभ्यता का प्रमुख केंद्र और पौष्टिक मेवों का मुख्य उत्पादक भी था। भारत में मुगल सल्तनत के संस्थापक जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक ए बावरी’ में मुक्त कंठ से अफगानिस्तान के इन शहरों की सराहना की है और काबुल को पूरे विश्व में सभ्यता का मुख्य केन्द्र बताया है। दो दशक से अधिक के शासनकाल में बाबर के अधीन वह सारा हिस्सा रहा जिसे आज आधुनिक अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है। बाबर ने अपनी किताब में कहा है कि सन 1504 ई में बर्फीले तूफान के बीच अपने तीन सौ साथियों के साथ मातृभूमि फरगाना से चलकर हिन्दूकुश पर्वत को पार करते हुए उसने काबुल में प्रवेश किया और खुद को वहां का शासक घोषित कर दिया। सन् 1511 ई तक उसके राय की सीमाएं ताशकंद से काबुल और गजनी तक फैल गई थीं जिसके तहत समरकंद, गोखारा, हिसार, कुंदुज और फरगना शामिल थे। इतना ही नहीं बाबर के काबुल प्रेम और खूबसूरती का वर्णन उसकी पुत्री गुलबदन बेगम ने भी अपने संस्मरण में किया है। इतिहासकारांे की राय में बाबर ने अपने संस्मरण में अफगास्तिान की प्रकृति, राजनीति, सभ्यता और संस्कृति के तमाम पहलुआें का बारीकी से वर्णन किया है। चारों तरफ पहाड़ों से घिरे काबुल के फलों की उसने बड़ी तारीफ की है जिसमें अंगूर, अनार, खुमानी, सेब, नाशपाती, बेर, आलूबुखारा, अंजीर और अखरोट जैसे फलों का विवरण है। बाबर ने अपनी किताब में अफगानिस्तान की गर्म घाटी में पैदा होने वाले गन्ने, संतरे और गलगल के बारे में भी लिखा है। इतना ही नहीं किताब में उन काफिलों का भी उल्लेख किया गया है जो फरगाना, तु*++++++++++++++++++++++++++++र्*स्तान, समरकंद, बुखारा, बलक, हिसार और बदख्शां से काबुल की आेर आते थे या पुरासान से कंधार की आेर जाया करते थे। संस्मरण में हिन्दुस्तान की आेर से लाए जाने वाले पशुआें, गुलामों और वस्त्रों के अलावा तरह तरह के मसालों और शक्कर का भी जिक्र किया गया है। बाबर की आत्मकथा के अनुसार वह काबुल के आसपास गिरने वाली बर्फ की खूबसूरती का कायल था। उसने यहां के सुन्दर चरागाहों का भी वर्णन किया है। उसने काबुल को एक ऐसे शहर के रूप में मान्यता दी है जहां की जलवायु की तुलना विश्व के किसी अन्य शहर की जलवायु से नहीं की जा सकती। उसने लिखा है कि वहां बसंत और गर्मी के बीच के समय बिना फर के कम्बल के सोया नहीं जा सकता है। आत्मकथा में बताया गया है कि बाबर को बागवानी का शौक था और उसने काबुल में बाग.ए.वफा नाम से एक उद्यान बनवाया। इसके अलावा भी उसने दस और बाग बनवाए। इन खूबसूरत उद्यानों में यादातर मद्यपान के आयोजन होते थे। उसकी चित्रकला में भी गहरी रूचि थी और हेरात शहर चित्रकला का एक बहुत बडा केन्द्र था। नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी गई बाबरनामा की सचित्र पोथी में कुल 378 पन्ने है और इनमें से 122 पन्नों पर 144 चित्र हैं। इन पर कुल 4मुगल चितेरों के नाम हैं जो मुख्य रूप से अकबर के समय में कार्यरत थे। इन चित्रों में खास बात यह है कि इनमें बाबर के प्रकृति प्रेम को बडी खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है और चित्रकारों ने अफगानिस्तान खास कर काबुल की प्राकृतिक शोभा को उकेरने में अपनी प्रतिभा का शानदार परिचय दिया है। राधा और कृष्ण के प्राचीन चित्रों सहित अनेक पौराणिक. ऐतिहासिक चित्र शैलियों की खोज करके अंतराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें मान्यता दिलवाने वाले प्रसिद्ध कलाविद नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने यूनीवार्ता को बताया कि बाबरनामा के इन चित्रों में बाबर के प्रकृति प्रेम और वास्तु प्रेम के सहज दर्शन होते है। इन चित्रों में काबुल के सुंदर उद्यानों की शोभा बिखरी पडी है।

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