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जजिया की वापसी

तालिबान को इतिहास, पुरातत्व या किसी भी किस्म के ज्ञान से बैर है, लेकिन वे इतिहास से चुन-चुनकर ऐसी चीजें लागू कर रहे हैं, जो सिर्फ आधुनिक युग के साथ ही नहीं, बल्कि मानवीयता के सामान्य सिद्धांतों के भी खिलाफ है। ऐसा ही एक कदम पाकिस्तान की अफगान सीमा पर ओरकाई एजेंसी में सिखों से जजिया कर वसूलने का है। जजिया का नाम हमारे देश में औरंगजेब से जुड़ा है, सम्राट अकबर ने जजिया कर खत्म कर दिया था, जिसे औरंगजेब ने फिर लागू किया था। औरंगजेब कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं का प्रिय सम्राट है, हालांकि औरंगजेब से ही मुगल साम्राज्य का पतन शुरू होता है। तालिबान, इस्लाम का जो रूप लागू करना चाहते हैं, उसे शुद्धतावादी भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसके पीछे धर्म और धर्मशास्त्र की पढ़ाई भी नहीं है। वे कट्टरवादी नियमों की एक ऐसी व्यवस्था लागू करना चाहते हैं, जो उनके दावे के मुताबिक असली इस्लाम है, लेकिन वह बुनियादी तौर पर कमजोर के खिलाफ हिंसा की शक्ित को स्थापित करना है, चाहे वे अल्पसंख्यक हों या स्त्रियां। इस्लाम के नाम का राजनैतिक स्वार्थो का इस्तेमाल करते-करते पाकिस्तान के राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक नेतृत्व में वह नैतिक शक्ित नहीं बची है कि वे तालिबान के इस आक्रमण का जवाब दे सकें, इसलिए वे किसी तरह कट्टरपंथियों से समझौता करके अपना तत्काल बचाव कर रहे हैं। चूंकि अफगानिस्तान और कश्मीर में अपने सामरिक हितों के लिए पाकिस्तानी व्यवस्था ने इस्लाम की कट्टरपंथी व्याख्या की खूब मदद ली है इसलिए उसके अपने ही खेल में मात देने वाले तालिबान के आगे वह लाचार है। सिखों पर जजिया लगाने से तालिबान का कोई बड़ा आर्थिक हित नहीं सधता लेकिन वे फिर एक बार जता रहे हैं कि दुनिया के इस हिस्से में उनका राज चलता है। अब भी पाकिस्तान की व्यवस्था में इतनी शक्ित शायद है कि वह चाहे तो अपने को बचा ले, लेकिन पहले उसे स्वीकार करना होगा कि उसका सबसे खतरनाक शत्रु तालिबान हैं। इस जजिया कर से पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों का जो भी नुकसान हो, लेकिन असली और दूरगामी नुकसान तो पाकिस्तान को होगा।ं

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  • Web Title: जजिया की वापसी