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अंग्रेजों के खिलाफ बुलंद की थी आवाज

0 में अंग्रेजी राज को चुनौती देने वाले पुरखा लड़ाका तेलेंगा खड़िया का जन्म मुरगू में हुआ था। मुरगू नागफेनी के समीप कोयल नदी के किनार बसा है। खड़िया लोकगीतों के अनुसार इसी मुरगू इलाके में सन् 1850-60 के आसपास तेलेंगा खड़िया के नेतृत्व में जमींदारों, महाजनों तथा अंग्रेजी राज के खिलाफ जुझारू आंदोलन हुआ। यह आंदोलन मूलत: जमीन वापसी और जमीन पर झारखंडी समुदाय के परंपरागत हक की बहाली के लिए था। तेलेंगा के अभ्युदय के बाद र्का से दबे और जमींदार-पुलिस की मार से उत्पीड़ित समुदाय में नयी चेतना आयी। लोग संगठित होने लगे। तेलेंगा के सांगठनिक कौशल और साहसी नेतृत्व ने लोगों में अंग्रेजी राज के विरुद्ध विद्रोह की आग भर दी। देखते-ही-देखते समूचे खड़िया इलाके में तेलेंगा का संगठन ‘जोड़ी पंचैत’ खड़ा हो गया। जोड़ी पंचैत के लड़ाकों ने सुनियोजित तरीके से अंग्रेजों पर हल्ला बोलना शुरू कर दिया और मुरगू में मालगुजारी वसूली करने आये सिपाहियों और दलालों पर आक्रमण कर उन्हें गांव से खदेड़ डाला। यह तेलेंगा का पहला आक्रमण था। कोड़े और बंदूक की मार से पिटे खड़िया ऐसी हिम्मत कर सकते हैं, दारोगाओं ने सोचा न था। लेकिन, जब बार-बार उनके कारिंदों और सिपाहियों पर हमले होने लगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ी। सरकार ने तुरंत इलाके में पुलिस बल की संख्या बढ़ा दी और तेलेंगा को अपराधी घोषित कर दिया। पुलिस-प्रशासन के सहयोग से तेलेंगा और उसके साथियों को पकड़ने की मुहिम तेज कर दी। तेलेंगा और उसके प्रमुख साथी तुरंत भूमिगत हो गये। हार से बौखलाये सिपाहियों ने दूसर खड़िया गांव पर आक्रमण शुरू कर दिया। सिपाही जंगल से दूर वाले गांव पर हमला बोलते और निर्दोष तथा निहत्थे ग्रामीणों को अपना निशाना बनाते रहे, पर इन गांवों में भी उन्हें लोगों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। गांव में रह गयी औरतें मोर्चा संभालतीं और जो भी औजार मिलता, उसी से मुकाबला करतीं। खड़िया लोकगीत के अनुसार तेलेंगा को गिरफ्तार कर ‘जोड़ा भर बेड़ियों’ में बांध कर लोहरदगा लाया गया। जहां उन पर मुकदमा चलाया गया और 14-16 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा मिली। 23 अप्रैल 1880 ई में जब तेलेंगा अपने साथियों के साथ बैठक में थे, दलाल बोधन सिंह ने उन्हें पीछे से पीठ पर वार कर मार डाला। वीर तेलेंगा शहीद हो गये।ड्ढr (लेखक झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव हैं।)

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