दिल्ली के विवेक विहार अग्निकांड में जलकर मरने वालों की संख्या घट सकती थी, मगर कैसे?
Vivek Vihar fire: घरों में लोहे की ग्रिल और प्लास्टिक की जालियां सुरक्षा और सुविधा खातिर लगाई जाती हैं। लेकिन, दिल्ली के विवेक विहार में हुए अग्निकांड में यही ग्रिल और जालियां मौत का जंजाल साबित हुईं।

Vivek Vihar fire: घरों में लोहे की ग्रिल और प्लास्टिक की जालियां सुरक्षा और सुविधा खातिर लगाई जाती हैं। लेकिन, दिल्ली के विवेक विहार में हुए अग्निकांड में यही ग्रिल और जालियां मौत का जंजाल साबित हुईं। इनके कारण लोगों को भीषण आग से खुदको का रास्ता नहीं मिला और वो जिंदा जलकर मर गए। काफी मशक्कत के बाद दमकल कर्मियों ने मौके पर पहुंचकर ग्रिल काटकर कुछ लोगों को बाहर निकाला, लेकिन घर के पीछे की तरफ संकरी गलियां और बंद रास्ते रेस्क्यू अभियान में लगातार रुकावटें पैदा करते रहे।
धुआं भरते ही मची अफरा-तफरी
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में स्थानीय निवासी गुरदीप सिंह गिल के हवाले से बताया गया है- करीब साढ़े तीन बजे दूसरी मंजिल पर आग की शुरुआत हुई। देखते ही देखते ये आग पूरे हिस्से में फैल गई। कुछ ही मिनटों में धुआं इतना घना हो गया कि ऊपरी मंजिलों तक जाने वाली सीढ़ियां ही बंद हो गईं। लोगों के पास निकलने की कोई जगह नहीं थी। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
लोहे की ग्रिल काटने के लिए मंगाई कटर मशीन
आग जब भड़क रही थी, तभी आस-पास के लोगों ने मोर्चा संभाला और आग की लपटों में फंसे लोगों को बचाने की कोशिश में जुट गए। घरों से गद्दे मंगाए गए ताकि लोग कूद सकें। लेकिन घरों में लगे लोहे के ग्रिल रुकावट पैदा करते रहे। ऐसे में लोगों ने सूझ-बूझ दिखाते हुए लोहे की ग्रिल काटने के लिए कटर मशीन का इंतजाम किया। तब तक दमकल कर्मी मौके पर पहुंच चुके थे।
बालकनी और खिड़कियां खुलीं होतीं तो बच जातीं कई जान
दमकल कर्मियों ने भी मौके पर पहुंचकर ग्रिल काटकर कुछ लोगों को बाहर निकाला, लेकिन पीछे की तरफ संकरी गलियां और बंद रास्ते राहत कार्य में बड़ी बाधा बने। ये करने में काफी देर हो चुकी थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर बालकनियां और खिड़कियां खुली होतीं, तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी। जगह बढ़ाने और सुरक्षा के लिए जो ग्रिल लगाई गई थी, वही लोगों की जान की आफत बन गई।
मेट्रो शहरों के बसावट पर उठते सवाल
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बिल्डिंग के पीछे सिर्फ कुछ इंच की जगह बची थी, जिससे पाइप डालना भी मुश्किल हो रहा था। इसी वजह से दमकल की गाड़ियां पीछे तक नहीं पहुंच सकीं और सीढ़ियों तथा खिड़कियों के जरिए ही बचाव करना पड़ा। यह हादसा एक बार फिर दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में अवैध निर्माण, संकरी गलियों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फायर सेफ्टी के नियमों का पालन और इमरजेंसी एग्जिट का खुला रहना ऐसे हादसों में जान बचाने के लिए बेहद जरूरी है।
लेखक के बारे में
Ratan Guptaरतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।
रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।
लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।
रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।
इसके साथ ही आईआईएमसी की एकेडमिक पढ़ाई ने उन्हें रिपोर्टिंग, न्यूज प्रोडक्शन, मीडिया एथिक्स और पब्लिक अफेयर्स की गहरी समझ दी है। इसका सीधा असर उनके लेखन की विश्वसनीयता और संतुलन में दिखाई देता है।
और पढ़ें

