दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र संगठनों में हिंसक झड़प, प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और आईसा कार्यकर्ता भिड़े
दिल्ली यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन के दौरान दो छात्र संगठनों में हिंसक झड़प हो गई। दोनों संगठन एक-दूसरे पर हिंसा और धमकी देने का आरोप लगा रहे थे। दिल्ली पुलिस दोनों संगठनों द्वारा लगाए गए आरोपों और उनके जवाबों की जांच कर रही है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन के दौरान दो छात्र संगठनों में हिंसक झड़प हो गई। दोनों संगठन एक-दूसरे पर हिंसा और धमकी देने का आरोप लगा रहे थे। दिल्ली पुलिस दोनों संगठनों द्वारा लगाए गए आरोपों और उनके जवाबों की जांच कर रही है।
शुक्रवार शाम को दिल्ली विश्वविद्यालय में वामपंथी छात्र संघों द्वारा बुलाए गए विरोध प्रदर्शन में अफरा-तफरी मच गई। इससे पहले, अखिल भारतीय वंचित अधिकार दिवस के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय के कला संकाय में अखिल भारतीय समानता मंच द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में आईसा और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हो गई। आईसा कार्यकर्ता यूजीसी के नियमों में संशोधन करके भारत के कैंपसों से जातिगत भेदभाव को खत्म करने की मांग कर रहे थे।
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू
दो छात्र समूहों के बीच टकराव के बाद आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है। दोनों समूह एक-दूसरे पर हिंसा और धमकी देने का आरोप लगा रहे थे। वामपंथी समर्थित छात्र संघ आईसा के अनुसार, प्रतिद्वंद्वी छात्र समूह द्वारा कुछ छात्रों को कथित तौर पर धमकाया गया और जातिवादी गालियां दी गई।
पुलिस नाकाम रहीः आईसा
आईसा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे कथित हमलावरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाना गए थे। उनका दावा है कि इस दौरान भाजपा से जुड़ी एबीवीपी ने उनके सदस्यों पर हमला किया। अपने बयान में आईसा ने कहा कि दिल्ली पुलिस हमलावर भीड़ को तितर-बितर करने में नाकाम रही। यहां तक कि जब वे हटे भी तो यह भीड़ बार-बार वापस आ जाती थी। अंदर मौजूद छात्रों के वकील को थाने में प्रवेश नहीं करने दिया गया, जबकि जिनके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही थी वे लोग अंदर घुस गए।
घेरकर हमला करने का आरोप
आईसा ने अपने बयान में आरोप लगाया कि इस दौरान भीड़ और भी उग्र हो गई। हमले के विरोध में एकजुटता दिखाने आए छात्रों को घेरकर उन पर हमला करने की कोशिश करने लगी। हिंसक भीड़ को हटाने के बजाय पुलिस खड़ी देखती रही। भीड़ 'देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को', 'ब्राह्मणवाद जिंदाबाद' जैसे नारे लगा रही थी और विशेष रूप से महिला साथियों को निशाना बनाते हुए हिंसक इशारे कर रही थी।
एबीवीपी ने आरोपों का खंडन किया
इन आरोपों का खंडन करते हुए एबीवीपी ने आरोप लगाया कि एक यूट्यूब चैनल से जुड़ी एक महिला पत्रकार पर वामपंथी समर्थित छात्र कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर हमला किया। एबीवीपी दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने कह कि वामपंथी प्रदर्शन कर रहे थे और वहां एक महिला पत्रकार मौजूद थी। उसने उनसे कुछ सवाल पूछे। शायद उन्हें वे सवाल पसंद नहीं आए।
झूठे आरोप लगाकर सुर्खियों में रहना चाहते हैं
उन्होंने उसके साथ हिंसक व्यवहार किया। वीडियो में दिख रहा है कि कार्यकर्ता उसे थप्पड़ मार रहे थे। भीड़ उसके चारों ओर जमा हो रही थी और वे उसे घसीटकर ले जा रहे थे। सार्थक ने कहा कि एसएफआई, आइसा और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों का महत्व कम हो चुका है। इसलिए वे झूठे आरोप लगाकर सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।



