'उमर खालिद एंड हिज वर्ल्ड', किताब में जेल में बिताए 5 वर्षों की कहानी, दिल्ली दंगे के मामले में हुई है गिरफ्तारी

Feb 13, 2026 01:27 pm ISTSubodh Kumar Mishra हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली
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दिल्ली दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार जेएनयू के पूर्व शोधार्थी उमर खालिद को लेकर एक किताब लिखी गई है। यह किताब जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश करती है, जिसमें आशा, प्रतिरोध और असहमति की कीमत जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। किताब में कई हस्तियों ने अपना योगदान दिया है।

'उमर खालिद एंड हिज वर्ल्ड', किताब में जेल में बिताए 5 वर्षों की कहानी, दिल्ली दंगे के मामले में हुई है गिरफ्तारी

दिल्ली दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार जेएनयू के पूर्व शोधार्थी उमर खालिद को लेकर एक किताब लिखी गई है। यह किताब जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश करती है, जिसमें आशा, प्रतिरोध और असहमति की कीमत जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। किताब में जानी-मानी हस्तियों ने अपना योगदान दिया है।

जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद द्वारा और लोगों की ओर से उनके बारे में लिखे गए पत्रों, निबंधों और विचारों का संकलन करती 'उमर खालिद एंड हिज वर्ल्ड' नामक किताब सामने आई है। इसमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमे का सामना करते हुए जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश की गई है। किताब का संपादन शोधकर्ता और कार्यकर्ता अनिर्बन भट्टाचार्य, कलाकार शुद्धब्रता सेनगुप्ता और लेखिका और उमर की साथी बनोज्योत्सना लाहिड़ी ने किया है। किताब में इन लोगों ने खुद को उमर की आत्मीय साथी बताया है।

संपादकों ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि इस किताब में उमर का नाम लक्षित व्यक्ति के रूप में अंकित है। लेकिन, वास्तव में यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो सलाखों के पीछे है या सलाखों के पीछे डाले जाने के खतरे में है। ऐसा इसलिए है कि उसने एक बेहतर कल की कामना करने, सपने देखने और उसके लिए कार्य करने का साहस किया है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व शोधार्थी खालिद को 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। खालिद की जमानत याचिका कई बार खारिज की जा चुकी है।

किताब की शुरुआत खालिद द्वारा जेल से लिखे गए दो अप्रकाशित पत्रों से होती है। एक पत्र में वे '21वीं सदी के भारतीय फासीवाद' के उदय पर विचार करते हैं। उमर तर्क देते हैं कि कई भारतीयों के वास्तविक अनुभव संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वादों से मेल नहीं खाते। वे लिखते हैं कि हमने देखा है कि कैसे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों के प्रति समर्पित एक लोकतांत्रिक गणराज्य को भीतर से खोखला कर दिया गया है।

इस संग्रह में कई जानी-मानी हस्तियों के योगदान शामिल हैं। इनमें इतिहासकार रोमिला थापर और रामचंद्र गुहा, कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबडे और हास्य कलाकार कुणाल कामरा शामिल हैं। इस किताब में कार्यकर्ताओं और विद्वानों के भाषण, कविताएं और पत्र संकलित हैं, जिनमें खालिद के कुछ सह-आरोपी जैसे शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और नताशा नरवाल भी शामिल हैं।

जेएनयू की प्रोफेसर एमेरिटा थापर का इतिहास की बदलती व्याख्या पर दिया गया भाषण भी इस किताब में शामिल है। एमेरिटा ने बताया कि कैसे आजादी और इंकलाब जिंदाबाद जैसे शब्द स्वतंत्रता आंदोलन की नींव थे। उन्होंने लिखा कि आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो आश्चर्यजनक रूप से इन शब्दों के प्रयोग को राष्ट्र-विरोधी मानते हैं।

पुस्तक का समापन न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा खालिद को लिखे हस्तलिखित संदेश से होता है। ममदानी अपने संदेश में लिखते हैं कि मुझे अक्सर कड़वाहट पर आपके शब्द और इसे स्वयं को नष्ट न करने देने के महत्व की याद आती है। आपके माता-पिता से मिलकर बहुत खुशी हुई। हम सभी आपके बारे में सोच रहे हैं।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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