जिंदा रहने की प्रवृत्ति बुनियादी होती है, HC ने पत्नी की आत्महत्या के लिए पति को दोषी ठहराया

Subodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि आत्महत्या तेजी से सभ्य दुनिया की एक समस्या बनती जा रही है, जो अक्सर तनाव, सामाजिक दबाव व सहयोग प्रणालियों के टूटने के कारण होती है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए की।

जिंदा रहने की प्रवृत्ति बुनियादी होती है, HC ने पत्नी की आत्महत्या के लिए पति को दोषी ठहराया

दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि आत्महत्या तेजी से सभ्य दुनिया की एक समस्या बनती जा रही है, जो अक्सर तनाव, सामाजिक दबाव व सहयोग प्रणालियों के टूटने के कारण होती है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए की।

जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने ये टिप्पणियां पति द्वारा दायर अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कीं। पीठ पति की सजा को दहेज मृत्यु से बदलकर आत्महत्या के लिए उकसाना के तहत कर दिया है। हालांकि दहेज प्रताड़ना के तहत पति की सजा को बरकरार रखा है। आत्महत्या की प्रकृति पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि जीवित रहने की प्रवृत्ति सभी जीवित प्राणियों में बुनियादी होती है। अपनी जान लेना अक्सर ऐसी मजबूर करने वाली परिस्थितियों का परिणाम होता है, जो इस प्रवृत्ति पर हावी हो जाती हैं।

यह मामला जुलाई 1999 में अपीलकर्ता की पत्नी की मृत्यु से संबंधित है। महिला ने शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या कर ली थी। उसकी मृत्यु किसी ऐसे पदार्थ का सेवन करने से हुई, जिसके जहर होने का संदेह था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि मृतका को 50 हजार की दहेज की मांगों के संबंध में प्रताड़ित किया गया, जिसमें से 30 हजार उसके परिवार द्वारा पहले ही चुका दिए गए।

यह भी आरोप लगाया गया कि शेष रकम के लिए उसे लगातार दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। मृतका के माता-पिता व भाई की गवाही के आधार पर सत्र अदालत ने पति को दहेज प्रताड़ना व दहेज हत्या के तहत दोषी ठहराया था। पति को सात साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी।

सजा के खिलाफ पति की अपील पर पीठ ने पाया कि जहां दहेज की मांगों के संबंध में उत्पीड़न व क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी। वहीं यह दिखाने के लिए कोई निर्णायक सबूत नहीं था कि अपीलकर्ता ने मृतक की मृत्यु का कारण बनाया था।

कोर्ट ने मृतक के भाई को दिए गए कथित डाइंग डिक्लेरेशन (मृत्यु-पूर्व बयान) पर संदेह व्यक्त किया। पीठ ने उसके बयान में विसंगतियों तथा मेडिकल रिकॉर्ड में इस बात का उल्लेख किया कि मृतक उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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