अगर राष्ट्रीय राजधानी इन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकती तो...; किस अपील पर भड़क उठा SC
एसिड अटैक एक पीड़िता की हृदय विदारक अपील से सुप्रीम कोर्ट आश्चर्य और आक्रोश से भर गया। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली की अदालत से मांग की कि वह इस मामले की रोजाना सुनवाई करे। पीठ ने देरी से हो रही सुनवाई को शर्मनाक और व्यवस्था का मजाक बताया।

एसिड अटैक पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि उस पर हुए बर्बर हमले के 16 साल बाद भी उसे न्याय नहीं मिला है। साथ ही उसने वैसी अन्य महिलाओं की मदद करने की भी अपील की, जिन्हें एसिड पीने के लिए मजबूर किया गया था।
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली की अदालत से मांग की कि वह उनके मामले की सुनवाई रोजाना करे। पीठ ने देरी से हो रही सुनवाई को शर्मनाक और व्यवस्था का मजाक बताया। पीठ ने कहा कि एसिड हमलों के दोषियों को कानून प्रवर्तन प्रणाली से कोई सहानुभूति नहीं मिल सकती।
याचिकाकर्ता ने कहा कि एसिड पीने के लिए मजबूर महिलाओं को मौजूदा कानूनों के तहत समान सुरक्षा नहीं दी जाती है। इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ ने कहा कि यह अपराध 2009 का है और अभी तक मुकदमा पूरा नहीं हुआ है! अगर राष्ट्रीय राजधानी इन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकती, तो इससे कौन निपटेगा? पीठ ने कहा कि यह व्यवस्था के लिए शर्म की बात है।
अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली की तेजाब हमले की पीड़िता का न्यायिक व्यवस्था पर से भरोसा उठ गया था, जब तक कि एक जज ने उसके मामले की सुनवाई शुरू नहीं की। मामले की सुनवाई शुरू होने पर उसने उन अन्य महिलाओं के लिए भी आवाज उठाई, जिन्होंने इसी तरह के भयानक और अमानवीय हमलों का सामना किया था।
याचिकाकर्ता ने कहा, "मुझ पर तेजाब फेंका गया। मैं तो कानून के दायरे में हूं, लेकिन कई और लोगों को तेजाब पीने के लिए मजबूर किया जाता है और वे कानून के दायरे में नहीं हैं।" उन्होंने उन घटनाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि जहां अगर महिलाएं मरती नहीं हैं तो उन्हें गंभीर समस्याएं और शारीरिक विकलांगताएं झेलनी पड़ती हैं। यहां तक कि वे चलने या खाने में भी असमर्थ हो जाती हैं।
कोर्ट ने सरकार को एक नोटिस जारी किया है। इसमें ऐसे मामलों को खास तौर पर चिकित्सा देखभाल और मुआवजे के संबंध में मौजूदा कानून के दायरे में लाने के लिए एक अध्यादेश लाने पर विचार करने को कहा है। साथ ही सभी निचली अदालतों को अपने-अपने क्षेत्राधिकार में चल रहे तेजाब हमलों के मुकदमों के आंकड़े जमा करने का निर्देश दिया है।

लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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