बेटे ने कर दी पिता के पहचान की मांग, SC ने कहा- निजता का अधिकार महत्वपूर्ण नहीं; DNA टेस्ट कराएं
किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से किसी बच्चे के अपने जैविक पिता के बारे में जानने का अधिकार ज्यादा महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए एक व्यक्ति को डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया है। एक युवक ने खुद को उस व्यक्ति का जैविक पुत्र होने का दावा किया है।

किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से किसी बच्चे के अपने जैविक पिता के बारे में जानने का अधिकार ज्यादा महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए एक व्यक्ति को डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया है। यह निर्देश एक युवक द्वारा दायर पितृत्व संबंधी मुकदमे के संदर्भ में दिया गया है, जो खुद को उस व्यक्ति का जैविक पुत्र होने का दावा करता है।
जस्टिस संजय करोल और एन.के. सिंह की बेंच ने किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार की तुलना में किसी बच्चे के अपने जैविक पिता के बारे में जानने के अधिकार को ज्यादा महत्व दिया। बेंच के सामने एक पेचीदा मुद्दा सामने आया था। इसमें पितृत्व परीक्षण की लड़ाई में एक व्यक्ति और बच्चे के अधिकार को लेकर सवाल था।
बच्चे के पक्ष में आदेश पारित
सवाल था कि क्या यह उस पुरुष का निजता का अधिकार होगा कि वह डीएनए टेस्ट न करवाए या फिर यह बच्चे का अधिकार होगा कि वह अपने पिता के बारे में जाने? बेंच ने यह माना कि हितों का संतुलन बच्चे के पक्ष में झुकता है। इसलिए बेंच ने बच्चे के पक्ष में ही आदेश पारित किया। बेंच ने उस पुरुष की दलील को खारिज कर दिया, जिसने इस आधार पर टेस्ट का विरोध किया था कि बच्चे की मां के साथ उसका कोई शारीरिक संबंध नहीं था।
मां ने भी लंबी लड़ाई लड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि उस युवक की मां ने भी अपने हक और बेटे के भरण-पोषण के लिए उसके खिलाफ एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी। जब तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब तक बेटा व्यस्क हो चुका था। उस व्यक्ति ने कोर्ट को बताया कि उस महिला द्वारा उसके खिलाफ दायर किए गए रेप के मामले में उसे बरी कर दिया गया था। इसके बाद उसके ऊपर लगे सभी आरोप खत्म हो जाने चाहिए। उन दोनों के बीच के रिश्ते की प्रकृति की जांच करने से इनकार करते हुए कोर्ट ने इस मामले का फैसला इस नजरिए से किया कि उस युवक को अपने जैविक पिता के बारे में जानने का वैध अधिकार है।
हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रखा
26 साल के उस युवक ने दलील दी कि उसके पिता द्वारा लगातार इनकार किए जाने के मद्देनजर पितृत्व के प्रश्न को निर्धारित करने के लिए उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं है। उसने पितृत्व की घोषणा और संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए मुकदमा दायर किया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हितों का संतुलन निश्चित रूप से युवाओं के पक्ष में है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट तथा छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा डीएनए टेस्ट के पक्ष में दिए गए आदेशों को बरकरार रखा।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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