आपको अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लिखने का कोई हक नहीं, रेप पीड़िता का इलाज नहीं करने पर SC

एएनआई, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल की रेप पीड़िता का तुरंत इलाज नहीं करने पर एक प्राइवेट हॉस्पिटल और उसके डॉक्टर को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने उनके बर्ताव को बेरहम, क्रूर और असंवेदनशील बताया। साथ ही कहा कि अगर आप अपनी ड्यूटी नहीं निभाते हैं तो आपको अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लिखने का कोई हक नहीं है।

supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में रेप और मर्डर की शिकार चार साल की बच्ची को इमरजेंसी इलाज देने से मना करने के लिए एक प्राइवेट हॉस्पिटल और उसके डॉक्टर को कड़ी फटकार लगाई।सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने उनके बर्ताव को बेरहम, क्रूर और असंवेदनशील बताया। बेंच ने डॉक्टर के मेडिकल एथिक्स पर सवाल उठाए और हॉस्पिटल को चेतावनी दी कि अगर उनके इस बर्ताव के लिए उन पर कोई आर्थिक जुर्माना लगाया गया तो इसका बहुत बुरा असर होगा। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।

आपने उसे नजरअंदाज किया

कोर्ट ने हॉस्पिटल का पक्ष रख रहे वकील से कहा कि अगर आप अपनी ड्यूटी नहीं निभाते हैं तो आपको अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लिखने का कोई हक नहीं है। अगर आपमें थोड़ी भी संवेदनशीलता होती तो सुविधा न होने पर भी आप उस बच्ची को लेकर किसी दूसरे हॉस्पिटल जाते। क्या आपने इसलिए उसे नजरअंदाज किया क्योंकि वह गरीब थी? क्या वह आपकी फीस नहीं दे सकती थी?

आप इतने निर्दयी हैं कि…

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी स्थिति में किसी भी डॉक्टर से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चे को तत्काल चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करे। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऐसे जघन्य अपराध की शिकार बच्ची को आपके सामने लाया गया और आप इतने निर्दयी हैं कि आपने उसे चिकित्सा सहायता नहीं दी। अगर आपमें थोड़ी भी सहानुभूति होती तो आप उसे स्वयं अस्पताल ले जाते। मुख्य न्यायाधीश ने अस्पताल को उसके आचरण के संभावित परिणामों के बारे में चेतावनी दी।

आपने निर्दयतापूर्वक कार्य किया है

कोर्ट ने कहा कि अगर हम जुर्माना लगाते हैं तो इसका भयावह प्रभाव पड़ेगा। आपने अत्यंत निर्दयतापूर्वक कार्य किया है। कोर्ट की ये टिप्पणियां गाजियाबाद में चार साल की बच्ची के कथित रेप और हत्या से संबंधित मामले की सुनवाई जारी रखते हुए आईं। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस मामले की सुनवाई मंगलवार को करेगी।

गाजियाबाद पुलिस की कड़ी आलोचना

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने शुरुआती जांच में पूरी तरह से लापरवाही और असंवेदनशीलता दिखाने के लिए गाजियाबाद पुलिस की कड़ी आलोचना की थी। कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में देरी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों का जिक्र होने के बावजूद रेप और पोक्सो के तहत मामले दर्ज न करने और जांच व मेडिकल से जुड़ी कई अन्य कमियों की ओर इशारा किया था।

घटना के एक दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई

जांच में बड़ी कमियों को देखते हुए कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और नंदग्राम थाने के एसएचओ को घटनाओं का क्रम समझाने के लिए व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने गौर किया था कि घटना के एक दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई थी, जबकि पीड़िता चार साल की बच्ची थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए बेंच ने पाया कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स पर चोटें थीं, जिनसे पता चलता है कि किसी कुंद चीज से हमला किया गया था।

घटना को छिपाने की कोशिश की जा रही

इन जानकारियों के बावजूद पुलिस ने शुरू में इस मामले की जांच सिर्फ हत्या के मामले के तौर पर की। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब तक कोई ठीक से जांच नहीं हुई है और ऐसा लगता है कि इस घटना को छिपाने की कोशिश की जा रही थी। इससे पहले की सुनवाई में भी कोर्ट ने सवाल उठाया था कि पुलिस ने शुरू में सिर्फ हत्या और सबूत मिटाने से जुड़े अपराध ही क्यों दर्ज किए थे। कोर्ट ने देखा कि यौन उत्पीड़न के साफ संकेत होने के बावजूद शुरू में पोक्सो एक्ट या रेप से जुड़े प्रावधानों के तहत कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था।

अहम पहलुओं पर ठीक से ध्यान नहीं दिया

कोर्ट ने गौर किया कि रेप के आरोप बाद में तब जोड़े गए जब अपराध की गंभीरता का एहसास हुआ। जांच के अलावा कोर्ट ने मेडिकल और फोरेंसिक रिकॉर्ड की भी जांच की। कोर्ट ने देखा कि पंचनामे में यह नहीं बताया गया था कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स से खून बह रहा था। यह भी नहीं लिखा गया कि बच्ची ने कोई कपड़े पहने थे या नहीं। कोर्ट ने पोस्टमार्टम जांच में भी कमियां पाईं। कोर्ट ने पाया कि ऑटोप्सी करने वाले डॉक्टर ने यौन उत्पीड़न के आरोपों की सही जांच के लिए जरूरी अहम पहलुओं पर ठीक से ध्यान नहीं दिया था।

चुप रहने के लिए कहा गया

पीड़िता के पिता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने कोर्ट को यह भी बताया कि घटना के बाद परिवार को डराया-धमकाया गया था। इन बातों को रिकॉर्ड करते हुए बेंच ने उन आरोपों पर ध्यान दिया जिनमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों को गलत तरीके से बंधक बनाया गया। उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें घटना के बारे में चुप रहने के लिए कहा गया। इससे स्थानीय पुलिस सिस्टम पर उनका भरोसा खत्म हो गया।

डॉक्टर और अस्पताल के रवैये पर सवाल

कोर्ट को यह भी बताया गया कि सरकारी अस्पताल पहुंचने से पहले बच्चे की हालत गंभीर होने के बावजूद दो प्राइवेट अस्पतालों ने उसे भर्ती करने और इमरजेंसी इलाज देने से मना कर दिया था। आज की सुनवाई में मामले के इसी पहलू पर खास तौर पर ध्यान दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के 'गोल्डन आवर' (इलाज के लिए सबसे अहम समय) के दौरान तुरंत मेडिकल मदद देने से इनकार करने को लेकर एक डॉक्टर और प्राइवेट अस्पताल के रवैये पर सवाल उठाए।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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