5 घंटे तक जिंदा थी, बच सकती थी बच्ची, इलाज नहीं दिया तो मुआवजा दोः सुप्रीम कोर्ट

हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता बच्ची का इलाज करने से इनकार करने वाले दो प्राइवेट अस्पतालों को मुआवजा देने का आदेश दिया है। गंभीर चोट लगने के बाद भी बच्ची करीब 5 घंटे तक जीवित रही, लेकिन समय पर इलाज नहीं मिलने से उसकी मौत हो गई। कोर्ट बच्ची के पिता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

supreme court of India.
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गाजियाबाद में दुष्कर्म पीड़िता बच्ची का इलाज करने से इनकार करने वाले दो निजी अस्पतालों को 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। इलाज करने से इनकार करने की वजह से बच्ची की मौत हो गई थी। शीर्ष अदालत ने जीवन बचाने के लिए मेडिकल संस्थानों की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया ।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि मौजूदा मामला कानूनी सुरक्षा उपायों और जमीनी स्तर पर उनके लागू होने के बीच एक परेशान करने वाली कमी को उजागर करता है। पीठ ने कहा कि गंभीर अपराधों के पीड़ितों के मामलों को संभालने के लिए अस्पतालों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करेगी, ताकि भविष्य में इस तरह की घटना दोबारा न हो। शीर्ष अदालत ने इस मामले में गठित एसआईटी की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद मुआवजा देने का आदेश दिया।

अस्पतालों को 4 सप्ताह का समय

एसआईटी की रिपोर्ट में कहा गया कि गंभीर चोट लगने के बाद भी बच्ची लगभग पांच घंटे तक जीवित रही लेकिन उसे समय पर इलाज नहीं मिला। इसके बाद पीठ ने सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल को 10 लाख रुपये और खजान सिंह मन्वी हेल्थ केयर सेंटर को 2 लाख रुपये बच्ची के पिता को भुगतान करने का आदेश दिया। पीठ ने दोनों अस्पतालों को मुआवजा राशि देने के लिए 4 सप्ताह का समय दिया। सुप्रीम कोर्ट बच्ची के पिता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो दिहाड़ी मजदूर है और मार्च की घटना की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग कर रहे थे।

अस्पताल जान बचा सकते थे

पीड़ित परिवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने पीठ से कहा कि अस्पतालों में बच्ची की हालत स्थिर करने के लिए जरूरी सुविधाएं थीं, लेकिन वे ऐसा करने में नाकाम रहे। उन्होंने पीठ से कहा कि पहले अस्पताल ने तो इमरजेंसी डॉक्टरों को बुलाने की कोशिश भी नहीं की, जबकि दूसरे मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल ने भी जान बचाने वाला इलाज नहीं दिया।

पुलिस पर मामला दर्ज करने में देरी का आरोप

वरिष्ठ अधिवक्ता ने पुलिस जांच में हुई कमियों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करते समय पुलिस ने पिता का बयान ठीक से दर्ज नहीं किया और हालात से यौन उत्पीड़न का संकेत मिलने के बावजूद शुरू में सिर्फ हत्या का ही मामला दर्ज किया गया। साथ ही, पुलिस पर प्राथमिकि दर्ज करने में लगभग 30 घंटे की देरी करने का भी वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया।

‘खून बहते मरीज को रेफर करना जानलेवा’

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ‌ कहा कि गंभीर रूप से घायल बच्ची को दो किलोमीटर दूर किसी दूसरे अस्पताल में भेजना जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि जिस मरीज का खून बह रहा हो, उसे दो किलोमीटर की दूरी भी जानलेवा हो सकती है‌। जस्टिस बागची ने कहा कि चार साल के पीड़ित को कहीं और भेजने से पहले कम से कम खून या दूसरी इमरजेंसी केयर दी जानी चाहिए थी।

16 मार्च को बच्ची से हुई थी बर्बरता

यह मामला 16 मार्च को चार साल की बच्ची की बर्बर तरीके से दुष्कर्म के बाद हत्या से जुड़ा है। आरोप है कि एक पड़ोसी बहला-फुसलाकर बच्ची को एकांत जगह पर ले गया और उससे रेप किया। बच्ची अपने परिवार को बेहोश और बुरी तरह खून से लथपथ मिली थी। परिजन बच्ची को दो निजी अस्पतालों में ले गए, लेकिन अस्पतालों ने कथित तौर पर इलाज देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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