देखिए, इस शहर का कामकाज कितने कामचलाऊ तरीके से चल रहा है, दिल्ली के बारे में SC
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अतिक्रमण को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से कहा कि आप इस तरह किसी शहर का कामकाज नहीं चला सकते। 20 साल से दिल्ली में मास्टर प्लान लागू नहीं होने दिया गया है। कोर्ट 'यमुना एक्शन प्लान' तैयार करने से जुड़ी कार्यवाही पर सुनवाई कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और निर्माण कार्यों को अस्थायी सुरक्षा देने वाले कानून की बार-बार समय-सीमा बढ़ाने से दिल्ली के प्रशासन में अस्थायी व्यवस्था को बढ़ावा मिला है। इससे यमुना नदी के किनारे से अतिक्रमण हटाने की किसी भी कार्ययोजना पर असर पड़ सकता है। कोर्ट दिल्ली और कई अन्य राज्यों से होकर बहने वाली यमुना नदी के संरक्षण के लिए एक व्यापक 'यमुना एक्शन प्लान' (YAP) तैयार करने से जुड़ी कार्यवाही पर सुनवाई कर रहा था। इस साल मई में कोर्ट ने यह प्लान तैयार करने के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि 'नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉज (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 2006' के तहत मिल रही लगातार सुरक्षा के कारण प्रस्तावित प्लान को लागू करना मुश्किल हो सकता है। बेंच ने कहा कि देखिए, इस शहर का कामकाज कितने कामचलाऊ तरीके से चल रहा है। दिल्ली के लिए एक मास्टर प्लान है, लेकिन उसे 20 साल से लागू ही नहीं होने दिया गया है। कोर्ट 2006 के उस कानून का जिक्र कर रहा था, जो अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और अनधिकृत निर्माणों को सीलिंग और तोड़-फोड़ से सुरक्षा देता है। मूल रूप से एक अस्थायी उपाय के तौर पर लाए गए इस कानून की अवधि बार-बार बढ़ाई गई है और इसे आखिरी बार 2023 में 31 दिसंबर, 2026 तक के लिए बढ़ाया गया था। बेंच ने टिप्पणी की कि इसी वजह से कामचलाऊ व्यवस्था वाली स्थिति बन रही है। 2006 का एक्ट हर चीज को सुरक्षा देता है। अगर आप यमुना एक्शन प्लान लाते भी हैं तो उसे लागू न कर पाने पर पूरी कवायद बेकार हो जाएगी।
इस तरह कामकाज नहीं चला सकते
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली 2047 के लिए मास्टर प्लान फाइनल कर दिया गया है। इस पर बेंच ने कहा कि आप इस तरह किसी शहर का कामकाज नहीं चला सकते। 20 साल से दिल्ली में मास्टर प्लान लागू नहीं होने दिया गया है। कोर्ट की मदद कर रहे सीनियर वकील (एमिकस) के. परमेश्वर ने कहा कि कोर्ट के 21 मई के आदेश के मुताबिक, केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी ने यमुना एक्शन प्लान का ड्राफ्ट तैयार किया है, लेकिन इसे फाइनल करने में अभी और समय लगेगा। 2006 के एक्ट को देखते हुए इसके लागू होने से जुड़ी चिंताओं पर परमेश्वर ने इस मामले की जांच करने और सुझाव देने पर सहमति जताई।
तब तक कोई एक्शन प्लान लागू नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर के लिए तय की और कमेटी को यमुना एक्शन प्लान जमा करने के लिए और समय दिया। एमिकस ने बताया कि 2006 का एक्ट अस्थायी तौर पर लाया गया था, लेकिन इसे लागू होने के बाद से कई बार बढ़ाया गया है। बेंच ने कहा कि राजनीतिक प्रशासन किसी भी प्लान को लागू नहीं होने देगा। बेंच में शामिल जस्टिस मनमोहन ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान के एक मामले का अनुभव शेयर किया। उन्होंने बताया कि निजामुद्दीन वेस्ट में एक बस्ती बन गई थी, जिससे यमुना में पानी का प्राकृतिक बहाव रुक गया था। मॉनसून के दौरान इसके कारण पानी वापस बहने लगा और महारानी बाग जैसे इलाकों में बाढ़ आ गई। जब हम उस बस्ती को हटाना चाहते थे तो राजनीतिक प्रशासन ने 2006 के एक्ट का हवाला देते हुए हमें ऐसा करने नहीं दिया। इस एक्ट में कानूनी रोक का प्रावधान है। जब तक इसमें बदलाव नहीं किया जाता, तब तक कोई एक्शन प्लान लागू नहीं किया जा सकता।
यमुना को सीवेज नाले जैसा बना दिया
बेंच ने कहा कि मास्टर प्लान की अवधि लगभग 20 साल होती है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 2006 के एक्ट के कारण इसे रोक दिया गया है। कोर्ट ने 21 मई के अपने आदेश में कहा था कि नदी के तल पर कब्जा (खासकर दिल्ली के संवेदनशील जोन 'O' में), अवैध उद्योगों से जहरीले कचरे का बेरोकटोक बहाव, अनधिकृत कॉलोनियों से बिना साफ किया गया सीवेज और बारिश के पानी की नालियों में सीवेज का मिलना। इन सबने यमुना को एक सीवेज नाले जैसा बना दिया है।
कड़े फैसले लेना जरूरी
कोर्ट ने नदी के संरक्षण के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने को कहा, क्योंकि कई एजेंसियां अक्सर अलग-अलग या एक-दूसरे के विपरीत काम करती हैं। कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को शामिल करे जिनसे होकर यमुना बहती है। साथ ही उनके राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुखों और एमिकस क्यूरी को भी इसमें शामिल करे। कोर्ट के आदेश में यह भी कहा गया कि एजेंसियां अक्सर एक-दूसरे के उलट काम करती हैं। प्रदूषण कम करने के बजाय वे इसे और बढ़ा रही हैं। अतिक्रमण हटाना, गैर-कानूनी उद्योगों को बंद करना और अनधिकृत कॉलोनियों को दूसरी जगह बसाना जैसे कड़े फैसले लेना जरूरी है। ऐसे उपाय तभी सफल हो सकते हैं जब भारत सरकार, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मिलकर काम करें।
इसे ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने समिति को 'नमामि गंगे कार्यक्रम' जैसी एक लंबी अवधि की, एकीकृत रणनीति बनाने का निर्देश दिया। इसमें इसके उद्देश्य, लागू करने की रणनीति, हर एजेंसी की भूमिका और जिम्मेदारियां, बजट आवंटन और समय-सीमा तय की गई हो।


