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सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल सरकार पर छोड़ा ऑड ईवन का फैसला, जानिए क्या कहा

पहले कोर्ट ने कहा था कि ऑड ईवन से कुछ खास फायदा नहीं हुआ। इस पर दिल्ली सरकार की ओर से कहा गया था कि रिसर्च से पता चला कि इस योजना से थोड़ा फर्क पड़ा है और सड़कों पर ट्रैफिक भी कम है।

सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल सरकार पर छोड़ा ऑड ईवन का फैसला, जानिए क्या कहा
Aditi Sharmaलाइव हिंदुस्तान,नई दिल्लीFri, 10 Nov 2023 02:04 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए ऑड ईवन का फैसला दिल्ली सरकार पर छोड़ दिया है। कोर्ट का कहना है कि दिल्ली में ऑड ईवन लागू करना है या नहीं, इसका फैसला खुद दिल्ली सरकार करे। इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि ऑड ईवन से कुछ खास फायदा नहीं हुआ। इस पर दिल्ली सरकार की ओर से कहा गया था कि रिसर्च से पता चला कि इस योजना से थोड़ा फर्क पड़ा है और सड़कों पर ट्रैफिक भी कम है। 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा, अगर आपको लगता है कि ऑड ईवन स्कीम से असर हो रहा है तो आपको जो सही लगे वही कीजिए। इस पर फैसला आपको लेना है। इसमें हम अपनी कोई राय जाहिर नहीं कर रहे। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि हमारे हस्तक्षेप करने के बाद ही तेजी आती है। हम उपायों को ग्राउंड लेवल पर लागू करना चाहते हैं।

जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हो रहा- SC

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमारे पास कई रिपोर्ट और समितियां हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हो रहा। हम परिणाम देखना चाहते हैं, हम तकनीकी लोग नहीं हैं। जस्टिस कौल ने कहा, सुबह बारिश हुई और प्रदूषण में थोड़ा सुधार हुआ. इसमें दिल्ली सरकार का धन्यवाद नहीं बनता। दिल्ली सरकार ने कहा कि ऑड ईवन से जो भी सुधार आया है उसकी रिपोर्ट दी गई है।

पराली जलाने की घटनाएं रोकनी होंगी- SC

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब और दिल्ली से सटे कुछ अन्य राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं रोकनी होंगी और दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए समाधान खोजना होगा। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने  खतरनाक वायु प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि प्रदूषण से जुड़ी कई रिपोर्ट और समितियां हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं हो रहा।

पीठ ने कहा कि कोर्ट परिणाम देखना चाहता है। कोर्ट को बताया गया कि पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। शीर्ष अदालत वायु प्रदूषण पर 1985 में पर्यावरणविद् एम सी मेहता द्वारा दायर एक याचिका पर विचार कर रही है और इसी मामले की सुनवाई के दौरान पराली जलाए जाने का मुद्दा उठा।

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